निचली अदालत का फैसला त्वरित न्यायालय द्वारा बरकरार

निचली अदालत का फैसला त्वरित न्यायालय द्वारा बरकरार

By: Sanjeev kumar
December 06, 09:12
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SAMASTIPUR (RAMAN KUMAR): समस्तीपुर जिला व्यवहार न्यायालय के फास्ट ट्रेक कोर्ट टू के पीठासीन पदाधिकारी रामशंकर सिंह ने आपराधिक अपील संख्या 43/1996 में आदेश पारित कर निचली अदालत के जी. आर 1747/1993,टी. आर नम्बर 27/1996 में पारित आदेश दिनांक 25/4/1996 को सही ठहराया हैं।निचली अदालत द्वारा पारित उक्त निर्णय में किसी प्रकार की त्रुटि न मिलने को भी स्वीकार करते हुए अपीलीय न्यायालय सजा के बिंदु पर भा. द. वि.की धारा 147,448 के अंतर्गत क्रमशः 6 माह एवं 1 वर्ष का सश्रम कारावास में संशोधन करते हुए अभियुक्तों को परिवीक्षा अधिनियम की धारा 3 के तहत सम्यक भर्त्सना के उपरांत निचली अदालत के पारित आदेश को परिवर्तित किया हैं।इस प्रकार सजा के बिंदु पर मामूली संशोधन के साथ निचली अदालत द्वारा पारित निर्णय को संपुष्ट किया गया।जिससे अभियुक्तों को एक सप्ताह में मकान खाली करने का आदेश पारित करते हुए दस हजार रुपए का सूचक को मुआवजा के रूप में देने का निर्देश था।

 ज्ञातव्य हो कि महात्मा गांधी पथ स्थित एक मकान को न्यायालय के आदेश पर सिविल कोर्ट के नाज़िर द्वारा खाली कराया गया था।इसके बाबजूद अपीलकर्ता नवल किशोर सिंह अधिवक्ता एवं उनके चचेरे भाई सुरेश कुमार सिंह ने संयुक्त रूप से  खाली कराये गए मकान में बलात् प्रवेश कर गए थे।इसके विरुद्ध सूचक देव नारायण पौद्दार ने जी. आर. नम्बर 1747/93 मुकदमा दर्ज कराया था।इस वाद में अभियुक्तों को क्रमशः एक वर्ष एवं छह महीने का सश्रम कारावास समेत दस हजार रुपये मुआवजा के रूप में सूचक को देकर एक सप्ताह में मकान खाली करने का आदेश निचली अदालत ने पारित किया था।इस निर्णय के विरुद्ध नवल किशोर सिंह अधिवक्ता व सुरेश कुमार सिंह ने संयुक्त रूप से जिला न्यायालय में अपील वाद संख्या 43/1996 दाखिल किया था।

  अपील वाद के अपीलकर्ता अधिवक्ता रविन्द्र प्रसाद सिन्हा एवं उत्तरवादी की ओर से अपर लोक अभियोजक पंकज देव थे। दलसिंहसराय अनुमंडलीय अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष नवल किशोर सिंह को न्यायालय द्वारा कनविक्शन पर  संघ के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की हैं। उपाध्यक्ष शिवचन्द्र प्रसाद सिंह ने कहा कि न्यायालय के इस फैसले के बाद संघ के अध्यक्ष को स्वतः इस्तीफा दे देना चाहिए।अब तक इन्होंने संघ को अंधकार में रखकर अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होकर कार्यरत हैं।

   उपाध्यक्ष जटाशंकर राय ने कहा कि मेरे महासचिव काल मे मुझ पर भा. द. वि 302 धारा में मात्र नाम आने पर मैंने नैतिकता के आधार पर तत्कालीन संयुक्त सचिव शैलेन्द्र झा को महासचिव का प्रभार दे दिया था।अपीलीय न्यायालय द्वारा कन्विक्टेड व्यक्ति को संघ के अध्यक्ष पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हैं।

 सहायक सचिव पृथ्वी राज गिरी ने कहा कि संघ के अध्यक्ष का मामला हैं।संघ में इस बात पर विमर्श होगा।अभी तो अधिवक्ताओं को इस बात की जानकारी भी नहीं हैं।सर्वप्रथम नैतिकता के आधार पर अपने पद से इस्तीफा देकर किसी वरीय उपाध्यक्ष को पदभार सौप देना चाहिए। कोषाध्यक्ष संजीव कुमार वर्मा ने कहा कि संघ के अध्यक्ष को न्यायालय के द्वारा आरोप के आधार पर दण्डित किया गया हैं।इसके अतिरिक्त संघ के अध्यक्ष होने के कारण वे कैबिनेट के सदस्य भी हैं।पूरे मामले की पड़ताल के बाद यह कहा जा सकता हैं कि उनका पद पर बना रहना सर्वथा उचित नहीं हैं।

 

  संघ के संयुक्त सचिव सदानन्द सिंह ने न्यायालय द्वारा दोषी पाए जाने के बाद अध्यक्ष को नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने पद को त्याग कर देना चाहिए।संघ के सदस्यों में वसुन्धरा खुर्शीद, अजय कुमार, सुमन कुमार चौधरी,प्रभात कुमार  आदि अनेक सदस्यों ने एक स्वर से इस्तीफे की माँग की हैं।इसी प्रकार अधिवक्ता संघ के दर्जनों अन्य वरिष्ठ सदस्यों ने भी नाम नहीं खोलने की शर्त पर बताया कि अपीलीय न्यायालय द्वारा कनविक्शन के बाद एक क्षण के लिये अध्यक्ष को अपने पद पर बने रहने का न कानूनी अधिकार हैं न नैतिक अधिकार हैं।

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