राम-सीता से सीखें, अधिकारों से नहीं कर्तव्यों से चलती है गृहस्थी

राम-सीता से सीखें, अधिकारों से नहीं कर्तव्यों से चलती है गृहस्थी

By: Sudakar Singh
November 23, 09:11
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सनातन धर्म में विवाह एक दिव्य परंपरा है। ये जीवन का वो पड़ाव है, जहां से इंसान गृहस्थ जीवन की शुरुआत करता है। प्राचीन भारत में गृहस्थी बसाना सामाजिक जिम्मेदारी की शुरुआत मानी जाती थी। सत्य ये है कि सनातन परंपराओं में जो चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्ास) कहे गए हैं इनमें गृहस्थ को ही सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। 


अगहन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को भगवान श्रीराम और जगतजननी सीता का विवाह हुआ था। शास्त्रों ने इस दिन को विवाह पंचमी कहा है। गृहस्थों के लिए राम-सीता का वैवाहिक जीवन आदर्श है। राम-सीता विवाह की चर्चा इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि ये संभवतः एकमात्र पति-पत्नी हैं, जिनके रिश्ते में हमेशा कर्तव्य मुख्य रहा, दोनों ने कभी अधिकारों की बात नहीं की।

ये पहला सबक राम-सीता की गृहस्थी से लिया जा सकता है। जब हम कर्तव्यों को छोड़ सिर्फ अधिकारों पर टिक जाते हैं तो गृहस्थी को नर्क होने में समय नहीं लगता। कर्तव्य पूरे करते चलें, अधिकार स्वयं मिलते जाएंगे। आज गृहस्थी में ये ही नहीं हो रहा है, इसलिए तलाक के मामले बढ़ते जा रहे हैं। वास्तव में विवाह कोई परंपरा मात्र नहीं है, ये समाज के प्रति हमारे दायित्वों का प्रतीक है। 


इस विवाह और गृहस्थी में वो सब है, जो एक आम आदमी को सीखना चाहिए या उसे अपनी गृहस्थी चलाने में मदद कर सकता है। मौन रहकर भी अपनी बात कह देना, बिना सुने ही चेहरे के भाव से मन की दशा को समझना ये सिर्फ राम-सीता के वैवाहिक जीवन में देखा जा सकता है।

राम कथा कहती है राम-लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ ताड़का और अन्य राक्षसों का वध कर ऋषियों को उनके संताप से मुक्त कराने के लिए निकले। राक्षसों के वध के बाद वे विश्वामित्र के साथ ही भ्रमण करते हुए, मिथिला (आज नेपाल का जनकपुर) के पास गौतम ऋषि के आश्रम में पहुंचे। वहां गौतम के शाप से पत्थर हुई अहिल्या का उद्धार राम ने किया। इसके बाद उन्हें जनकपुर में हो रहे शिव धनुष यज्ञ और सीता स्वयंवर की सूचना मिली। मिथिला पहुंचकर राम ने शिव धनुष तोड़कर सीता से विवाह किया। 

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