कभी था श्मशान आज है धर्म स्थान, यहां बजती हैं शहनाइयां और गूंजते हैं मंगलगीत 

कभी था श्मशान आज है धर्म स्थान, यहां बजती हैं शहनाइयां और गूंजते हैं मंगलगीत 

By: Anurag Goel
November 15, 12:11
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DHARBHANGA : वर्तमान समय में दरभंगा राज अस्तित्व में नहीं है। लेकिन, उनकी विरासत की वजह से आज भी दरभंगा राज की यादें लोगों के जेहन में ताजा हैं। वैसे तो उनकी विरासत से संबंधित कई बातें हैं जिनका जिक्र अब भी होता है, लेकिन सबसे अद्भुत बात यह है कि दरभंगा राज का श्मशान स्थल।
श्मशान स्थल पर  दरभंगा महाराज ने अपने पूर्वजों की चिता पर भगवती की प्रतिमा स्थापित की और ये श्मशान स्थल अब मांगलिक कार्यों की शोभा बढ़ाता है। चिता पर बने मंदिर में शादी-ब्याह से लेकर सभी मांगलिक कार्य होते हैं और कहा जाता है कि यहां होनेवाले सभी मांगलिक कार्य अतिशुभ होते हैं। 

जानिए दरभंगा के श्मसान स्थल पर बने मंदिरों का रहस्य
दरभंगा शहर में दरभंगा राज का श्मशान स्थल कभी 51 बीघे में था। तब यहां जंगल ही जंगल था। पूरे देश के तंत्र साधक यहां आकर तंत्र साधना करते थे।बाद में दरभंगा महाराज ने अपने पूर्वजों के नाम पर उनकी चिता पर भगवती की प्रतिमाओं की स्थापना की। आज यह श्मशान स्थल लोगों की धार्मिक आस्था का केंद्र बन गया है। अब तो यहां शहनाइयां भी बजने लगी हैं। यह श्मशान स्थल माधेश्वर परिसर के रूप में जाना जाता है।
 
इसकी खासियत यह है कि यहां माधेश्वर नाथ महादेव मंदिर को छोड़कर श्यामा काली सहित अन्य देवियों के मंदिर दरभंगा राज के महाराजाओं व महारानी की चिता पर हैं। 
 
दरभंगा राज के शासकों में महाराजा माधव सिंह की काफी ख्याति रही। उन्होंने दरभंगा को राजधानी बनाई। माधेश्वर नाम से शिव मंदिर बनाकर इसे श्मशान स्थल के रूप में संरक्षित किया। यहां उन्होंने अपनी माता के नाम पर गंगा जी का मंदिर बनवाया।


 
ज्ञात हो कि इस परिसर में माधेश्वर शिव मंदिर ही एकमात्र मंदिर है, जो किसी की चिता पर नहीं है। साथ ही परिसर का सर्वाधिक पुराना मंदिर है। मां श्यामा लोगों की आस्था व विश्वास को केंद्र हैं। यह मिथिला का प्रसिद्ध काली मंदिर है। यहां प्रतिवर्ष  मां के लाखों भक्त पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
 
यह मंदिर दरभंगा राजवंश के धर्मानुराग का द्योतक है। मंदिर परिसर में आज शादी से लेकर हर मांगलिक अनुष्ठान व संस्कार होते हैं। शादी, मुंडन, उपनयन, कन्या निरीक्षण (शादी के लिए), सप्तशती सामान्य पाठ, कुमारी भोजन, बलि प्रदान दक्षिणा, हवन, विष्णु पूजन और वाहन पूजा आदि कार्य होते हैं। 
 
साल में एक बार मां श्यामा नाम धुन नवाह यज्ञ होता है। इसमें लाखों की संख्या में लोग भाग लेते हैं। यहां तक कि नेपाल से भी भक्त आते हैं। इस श्मशान स्थल के कण-कण में जीवन का दर्शन होता है। 


 
श्यामा मंदिर का इतिहास
दरभंगा राज के महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह ने अपने पिता प्रसिद्ध तांत्रिक व शक्ति के प्रबल उपासक महाराज रामेश्वर सिंह की चिता पर वर्ष 1933 में मां श्यामा काली मंदिर की स्थापना की। मां श्यामा की 
आदमकद प्रतिमा भगवान शिव की छाती पर है।
 
मां श्यामा के बगल में गणेश, वटुक भैरव व काल भैरव की प्रतिमाएं हैं। 1929 में महाराजा रामेश्वर सिंह की मृत्यु के चार वर्षों बाद उनकी चिता स्थल पर मां श्यामा की प्रतिमा की स्थापना की गई। 
 
मंदिर                           इनकी चिता पर 
रुदेश्वरी काली मंदिर         महाराजा रुद्र सिंह 
तारा मंदिर                     महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह 
श्यामा मंदिर                   महाराजा रामेश्वर सिंह 
अन्नपूर्णा मंदिर               महाराजा रामेश्वर सिंह की पत्नी अन्नपूर्ण देवी 
कामेश्वरी श्यामा काली       महाराजा कामेश्वर सिंह 
 
 


 

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