पीएम मोदी से गुहार…सर 'खून बेचकर भी नहीं चुका पा रहा हूं कर्ज'

  • 26 Dec, 2016
  • Roshan Kumar Jha

RANCHI : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार देश वासियों से लोन लेकर स्वरोजगार करने की अपील कर रहे हैं, लेकिन माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की ज्यादती के चलते लोग खुद का काम-धंधा शुरू करने के नाम से ही घबरा रहे हैं।

'गुंडे भेजकर धमकाते हैं…
रांची के हटिया गुरुद्वारा रोड की निकिता ने जीवन को रफ्तार देने के ख्वाहिश से माइक्रोफाइनेंस कंपनी से 30 हजार रुपए कर्ज लिया था। अब सारी ख्वाहिश बेड पर पड़े पति की सेवा तक सिमट गई है। कर्ज की राशि गर्भवती होने के बाद हुई बीमारी के इलाज में खर्च हो गई। जब माइक्रो फाइनेंस कंपनी कर्ज वसूली के लिए घर में गुंडे भेजने लगे तो पति-पत्नी के बीच का विवाद बढ़ गया। इसी बात से परेशान होकर पति ने आत्महत्या करने के लिए कुएं में छलांग लगा दी। जान तो बच गई, लेकिन जिंदगी अब बिस्तर पर सिमट गई है।

'20 लाख का मकान 12 लाख में बेचना पड़ा'
रांची में निकिता अकेली नहीं है जो माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के सब्जबाग और आसान ऋण के चक्कर में पड़ी हो। सिर्फ हटिया क्षेत्र में ही 400 से ज्यादा महिलाएं हैं जो न सिर्फ माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के दिखाए दिवास्वप्न में फंसी हैं, बल्कि कई तो घर बार भी बेच चुकी हैं। कर्जदार रीता देवी कहती हैं कि जरूरत पर इनसे कर्ज क्या लिया, जिंदगी बर्बाद हो गई। इनके कारण 20 लाख के मकान को 12 लाख में बेचना पड़ा। एक अन्य महिला ने बताया कि बच्चों के एडमिशन के लिए लोन लिया था, पर चुका नहीं पायी। अब हाल यह है कि लोन चुकाने के चक्कर में स्कूल की फीस तक जमा नहीं कर पा रही।

लोन के जाल में फंसाते हैं एजेंट
गरीब महिलाओं का कहना है कि पहले माइक्रोफाइनेंस कंपनी के एजेंट गांव में स्वयं सहायता समूह और स्वरोजगार के नाम पर आसानी से कर्ज दिलाते हैं फिर ऋण वसूली के लिए रंगदारी पर उतर आती हैं।

शरीर में इतना खून भी नहीं कि जिसे बेचकर चुका पाएं कर्ज

इतना ही नहीं, 30 हजार के ऋण में इंश्योरेंस और प्रोसेसिंग फीस के नाम पर हजारों रुपए पहले ही काट लिए जाते हैं। कर्ज वसूली के नाम पर जोर जबरदस्ती ऐसी कि कई महिलाएं खून बेचने के लिए अस्पताल तक पहुंच गईं। लेकिन गरीबी की मार देखिए जनाब। शरीर में खून होता तो भला ये गरीब कहां होती सो डॉक्टरों ने भी खून लेने से इनकार कर दिया।
ऐसी ही एक महिला बेबी देवी ने कहा कि पैसे के लिए खून बेचने अस्पताल गई थी, पर शरीर में खून कम है, कह कर उन्होंने बैरंग लौटा दिया।
 
याद दिलाती है महाजनी प्रथा की क्रूरता
रांची के प्रताड़ित गरीब महिलाओं की हालत बयां करती है कि माइक्रो फाइनेंस कंपनियों ने महाजनी प्रथा जैसी क्रूरता कर रही है। सरकारी बैंक या डाकघर जहां अधिकतम 13 फीसदी सालाना के ब्याज पर कर्ज देती है, वहीं माइक्रोफाइनेंस कंपनियां 23 से 25 प्रतिशत का ब्याज लगाकर खून चुसती है।

राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र मिलने पर खुला राज
माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से प्रताड़ित महिलाओं में अपना दर्द सरकार तक पहुंचाने तक की ताकत नहीं बची हैं। समाजसेवी महिला सतरुपा पांडेय ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर गरीब महिलाओं को माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के मकड़जाल से छुड़ाने की गुहार लगाई।

कैमरा देखते ही भाग खड़े हुए वसूली एजेंट

जब पत्रकारों की टीम ने पूरी खबर के लिए हटिया में थी, तो उसी वक्त माइक्रोफाइनेंस कंपनी के लोग भी ऋण वसूली के लिए पहुंची थी। पर मीडिया को देखते ही वह वहां से खिसक गई । वहीं जब जब माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का हाल जानने के लिए उनके दफ्तर गई, हर जगह यही बताया गया कि प्रबंधक फील्ड में हैं।

क्या होती हैं माइक्रोफाइनेंस कंपनियां
माइक्रोफाइनेंस बैंकों को गरीबी दूर करने का आधुनिक तरीका समझा जाता है। इन कंपनियों की जिम्मेदारी होती है कि वे छोटे-मोटे रोजगार शुरू करने के लिए कम दरों पर लोन मुहैया कराती हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में माइक्रोफाइनेंस बैंक काफी अच्छा काम कर रहे हैं। वर्ष 2006 में बांग्लादेश के प्रोफ्रेसर यूनुस और ग्रामीण बैंक को माइक्रोक्रेडिट की दिशा में काम करने के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था।
 

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