आज भी तिब्बत में पढ़ी जाती है संस्कृत, भारत की है ये देन

  • 06 Jan, 2017
  • priti singh

PATNA: यह ऐसा समय है जब विनाशकारी भावनाएं, जैसे क्रोध, भय, घृणा संपूर्ण विश्व में विध्वंसकारी समस्याओं को जन्म दे रही है। ये विज्ञान की देन है। विज्ञान हमेशा भौतिक विकास पर बल देता है।

भौतिक विकास हमें शांति नहीं दे सकता। कालचक्र पूजा के चौथे दिन बोधगया में 14वें दलाई लामा ने प्रवचन के दौरान उक्त बातें कही। उन्होंने कहा कि शांति के लिए हमें आंतरिक विकास की जरूरत है, जो केवल धर्म-अध्यात्म से मिल सकता है।
समाज में क्लेश बढ़ रहा है। विज्ञान इससे मुक्ति का साधन नहीं दे रहा। उन्होंने कहा कि 1978 में उन्हें वैज्ञानिकों से इस मुद्दे पर चर्चा का मौका मिला, हमेशा विज्ञान के शांतिपूर्ण आंतरिक खुशी के उपाय खोजने को कहा। उन्होंने कहा कि बौद्ध शिक्षाएं यथार्थ को समझने के महत्त्व पर बल देती है।
प्रवचन के दौरान दलाई लामा ने संस्कृत परंपरा बौद्ध साहित्य की चर्चा करते हुए बताया कि उन्होंने आठ वर्ष की अवस्था में संस्कृत पढ़ा है। तिब्बत में आज भी संस्कृत पढ़ी जाती है। इसके बिना तंत्रवाद संभव नहीं है। भारत से संस्कृत तिब्बत गया था।

बिना खुशी दिए खुशी संभव नहीं है। अगर आप पत्नी से प्रेम नहीं करेंगे, पत्नी भी खुशी नहीं दे सकती। जर्मनी प्रवास की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने मुस्कुराते हुए कुछ महिलाओं को परस्पर खुशी बांटने को कहा था, जिसपर सभी मुस्कुरा दीं। इसी खुशी में सब कुछ है।

मैं शब्द की सत्ता खत्म किए बिना सम्मान नहीं मिल सकता। मैं दलाई लामा हूं, इस गुमान से मुझे सम्मान नहीं मिल सकता। मैं कारुणिक हूं, दूसरों की चिंता करता हूं, प्रेम सहिष्णुता का पाठ पढ़ाता हूं। इसलिए दलाई लामा हूं, सम्मानित हूं।
 

 

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