..तो क्या बिहार में बनेगी जदयू-भाजपा की सरकार

  • 06 Jan, 2017
  • Shashank Kumar

पटना: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले कई महीनों से मोदी सरकार के मुरीद बने हुए हैं।

सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर नोटबंदी तक के फैसले पर जहां पूरा विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ रहा है वहीं नीतीश कुमार ने सबसे अलग चलते हुए सर्जिकल स्ट्राइक की भी तारीफ की और फिर नोटबंदी पर भी पीएम मोदी का समर्थन किया। हालांकि वो सफाई दे चुके हैं कि इससे महागठबंधन पर कोई फर्क नहीं पड़ता और लालू के साथ रिश्तों में किसी तरह की खटास नहीं है, उनकी वापस एनडीए में जाने की अटकलें साजिश का हिस्सा हैं, लेकिन देखने वाले सार्वजनिक मंचों पर जो हो रहा है उसे देख कर आंखें भी तो नहीं मूंदे रह सकते। गठबंधन की सरकार होने के बावजूद हाल के दिनों में आरजेडी और जेडीयू में कई मामलों पर टकराव दिखाई दे चुका है।
दागी आरजेडी विधायक राजबल्लभ से लेकर सांसद शहाबुद्दीन तक के मामलों पर दोनों पार्टियां आमने सामने दिखाई दी हैं। बाहुबली शहाबुद्दीन ने तो नीतीश को अपना नेता मानने से ही इनकार कर दिया था और नीतीश को परिस्थितियों का मुख्यमंत्री तक बता दिया था। समझा जाता है कि इस पर लालू की चुप्पी नीतीश को अखर गई। आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी खुलेआम कई बार नीतीश पर निशाना साधा है। नोटबंदी पर विपक्ष के एकजुट होने के प्रस्ताव पर जेडीयू के अलग होने पर भी आरजेडी सुप्रीमो लालू ने नीतीश पर परोक्ष रूप से निशाना साधा था और इसे इगो की समस्या कहा था। 
 
पीएम मोदी ने नोटबंदी की समस्याओं के खात्मे के लिए 50 दिनों की मोहलत मांगी थी, ये वक्त एक हफ्ते पहले खत्म हुआ है, लेकिन एटीएम और बैंकों में कैश का संकट खत्म नहीं हुआ है। इसके बावजूद हफ्ता भर बीत जाने के बाद भी नीतीश ने अभी तक अपने समर्थन की समीक्षा करने के बारे में नहीं सोचा है। बल्कि इन 7 दिनों में उनसे नोटबंदी को लेकर जब भी सवाल किया गया तो वो उसे टाल गए हैं। नीतीश कुमार के इस तरह के रुख पर राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ये लालू पर राजनीतिक दबाव कायम रखने की कवायद हो सकती है। राजनीतिक तौर पर अति महत्वाकांक्षी लालू के सामने नीतीश शायद यही संदेश देना चाहते हैं कि विकल्प उनके सामने भी खुले हुए हैं।
 
वहीं, भारतीय जनता पार्टी को लगता है कि उसे स्वाभाविक तौर पर एक अतिरिक्त सहयोगी मिलने में कोई हर्ज नहीं है। राज्यसभा में केंद्र के सत्ताधारी गठबंधन का कम संख्याबल भी भारतीय जनता पार्टी को जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू से नजदीकी बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। कई अहम बिल अभी वहां पास होने हैं, ऐसे में भविष्य में भी अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार एक दूसरे के प्रति नरमी दिखाते नजर आते हैं तो ज्यादा आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के साथ से भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से ये भी कहती रह सकती है कि देखिए नीतीश जैसे कट्टर विरोधी भी अहम फैसलों पर सरकार के साथ हैं।
 
गुरुवार को गांधी मैदान में सुशील मोदी से सवाल किया गया की क्या भाजपा-जदयू फिर से साथ आ सकते हैं तो इस पर सुमो ने कहा था कि राजनीति स्थायी दोस्ती दुश्मनी का क्षेत्र नहीं है। राजनीति में कौन कहां जायेगा इसकी भविष्यवाणी ठीक नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि रामविलास पासवान पहले एनडीए में थे, फिर अलग हो गए, बाद में फिर साथ हो लिए।

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