लामाओं ने नृत्य कर की कालचक्र की पूजा, मंडल निर्माण पूरा

  • 10 Jan, 2017
  • priti singh

PATNA: कालचक्र मंडल के निर्माण के बाद सोमवार को कालचक्र पूजा के सातवें दिन इसे पूजा के लिए विधिवत समर्पित किया गया। इस मौके पर नामग्याल लामाओं ने नृत्य कर कालचक्र विश्वात्मा आह्वान किया।

दलाई लामा भी मौजूद थे। कालचक्र मंडल के निकट बैठे लामा वाद्ययंत्र बजा रहे थे मंत्रपाठ भी कर रहे थे। कालचक्र पूजा के दौरान बननेवाले मंडल के बीच में कालचक्र उनकी शक्ति विश्वात्मा का चित्रण किया जाता है।
कालचक्र सभी प्रकार की तृष्णाओं को कुचल कर साधक को बोधिचित्त की ओर अग्रसर करता है। इसके बारे में प्रारंभिक जानकारी बुतोन रिनछेन डूपा ने दी थी। कालचक्र की आकृति नीले रंग की होती है। इनके तीन गर्दन, चार चेहरे छह बाजू हैं। बीच वाली नीली गर्दन के साथ भयानक काला चेहरा है।
पीछे वाला चेहरा साधना में लीन दिखता है। दाहिनी ओर का चेहरा सफेद शांत है। वहीं बांया चेहरा सुंदर प्रसन्न मुद्रा दिखता है। इन्हें कालचक्र के साथ युगनद्ध मुद्रा में दिखाया गया है।
यह तांत्रिक नृत्यानुष्ठान महायान बौद्ध परंपरा का विशिष्ट अंग है। महायान परंपरा में वर्णित धर्मरक्षकों, धर्मपालों, देव-देवियों, अन्य दैवीय स्वरूपों के प्रतीक के रूप में वस्त्र धारण करके इस विशिष्ट तांत्रिक नृत्यानुष्ठान को संपन्न किया जाता है।
ऐसा माना जाता है कि इस नृत्य की उत्पत्ति भगवान बुद्ध के समय उनके द्वारा ही हुई थी। दशभूमि की परिकल्पना आध्यात्मिक उन्नति के सोपान के रूप में की गई है।
दलाई लामा के 1959 में तिब्बत से पलायन के क्रम में वहां से 55 नामग्याल लामा भी पलायन कर गए। धर्मशाला में इस मोनास्ट्री की फिर से स्थापना की गई। अब वहां 200 नामग्याल लामा हैं। बोधगया में 1938 में इसकी स्थापना हुई।
यहां 45 नामग्याल लामा प्रवास करते हैं, जो सभी बौद्ध साहित्यों का अध्ययन करते हैं। नामग्याल लामा दलाई लामा के धार्मिक अनुष्ठान का संपादन करने में सहयोग करते हैं। इसके पहले राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने सोमवार को बोधगया में दलाई लामा से भेंट की।
उन्होंने उनसे भेंट तिब्बती मंदिर में की। इस मौके पर दलाई लामा ने उन्हें खादा भेंट कर आशीष दिया राज्यपाल ने उन्हें भगवान बुद्ध की मूर्ति भेंट की। इससे पहले राज्यपाल महाबोधि मंदिर भी गए और पूजा अर्चना की।
 

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