वज्र शून्यता है और शून्यता धर्म का लक्षण

  • 12 Jan, 2017
  • priti singh

PATNA: ओंशून्यता ज्ञान वज्रस्वभा वावत्मोऽहम के साथ बोधगया में 34वें कालचक्र पूजा का अंतिम चरण शुरू हुआ। 14वें दलाई लामा ने कालचक्र मंडल में प्रवेश करते हुए साधकों को अभिषिक्त करते हुए बताया कि वज्र का अर्थ शून्यता है और ये शून्यता धर्म का लक्षण है।

इसे अच्छेद, अभेद्य अविनाशी माना गया है। वज्रसत्व में सत्व का अर्थ विशुद्ध ज्ञान है, जिसे भगवान कहा गया है क्योंकि वह मोह मार-तृष्णा को दूर करता है। जन्म और मृत्यु से रहित, सर्वज्ञ, विशुद्ध वज्रसत्व चित्तधारा के रूप में सर्व व्यापक है। वज्रसत्व को बुद्ध का समकक्ष माना गया है।
वज्रसत्व बोधिचित्त का ही रूप है। यह चित्त की ही एक अवस्था है।  खुशहाली के लिए की प्रार्थना: आलंबनकरते हुए तिब्बत चीन के सभी श्रद्धालुओं के लिए प्रार्थना, दलाई लामा ने इन शब्दों के साथ तिब्बत चीन से बोधगया नहीं पहुंच पाए श्रद्धालुओं के लिए कालचक्र की विशेष प्रार्थना की।
चीन द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के कारण तिब्बत से लगभग 70 से 80 हजार श्रद्धालु बोधगया नहीं सके है। 10वें दिन दलाई लामा के दीक्षा कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालु। अभिषेक का अर्थ है भावना की निष्पत्ति। बौद्ध तंत्र में ज्ञान, रूप जल से परिक्षालन को अभिषेक कहते हैं।
कालचक्र पूजा के दौरान जल अभिषेक, मुकुट अभिषेक, मुकुट कंठाहार अभिषेक, वज्रघंटा अभिषेक, वज्राचार अभिषेक, नाम अभिषेक अनुमति अभिषेक। इन सात अभिषेक से साधक बोधिचित्त को जाग्रत कर मध्यम माग्र को जान लेता है।
वह कालचक्र पूजा की अंतिम कड़ी को करने का हक प्राप्त करता है, जिससे बुद्धत्व की प्राप्ति होती है। दलाई लामा ने कहा कि वज्रसत्व वज्रधर एक है। बुद्धों के सामूहिक रूप को वज्रसत्व, वज्रधर कालचक्र कहते हैं।
संसार उदय की अभिव्यक्ति है। शून्यता की स्थापना इस मंत्र से हो- ओं शून्यता ज्ञानवज्रस्वभावावत्मोऽहम। उन्होंने कहा कि शरीर से ही सिद्धि मिलेगी। साधना का मुख्य साधन शरीर है। अतः कायशुद्धि होने पर ही चित्त शुद्धि हो सकती है।
काय, प्राण चित्त का इतना घनिष्ठ संबंध है कि एक की शुद्धि के बिना दूसरे की विशुद्धता नहीं हो सकती।
 

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