मकर संक्रांति पर बन रहा विशेष योग, पूरी होगी हर विश

  • 12 Jan, 2017
  • priti singh

PATNA: इस साल मकर संक्रांति के दिन स्वार्थसिद्धि और गजयोग का अद्भुत संयोग बन रहा है। ये योग सुख-समृद्धि के साथ धन्य-धान में वृद्धि कराएगा। सूर्य के दक्षिण से उत्तरायण होते ही इस दिन से शुभ कार्य शुभ हो जाएंगे।

आचार्य विनोद झा वैदिक के अनुसार 28 साल बाद संक्रांति पर स्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। सूर्य मकर राशि में 14 जनवरी की सुबह सात बजकर 37 मिनट में प्रवेश करेगा। इस कारण पूरा दिन पर्व मनाने का योग बनता है।
नक्षत्र के आधार पर सूर्य के उत्तरायण होने के बाद 16 जनवरी से मांगलिक कार्यो की शुरुआत हो जाएगी। इस दिन सूर्य देवता अपने पुत्र शनि के घर में प्रवेश करेंगे। धनु जब मकर राशि के घर में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति का योग बनता है।
मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान एवं दान-पुण्य का विशेष महत्व है। विनोद झा वैदिक के अनुसार मकर संक्रांति के दिन गंगा में स्नान कर तिल, अन्न आदि दान करने से लोगों का कष्ट कम होता है। पुण्य की प्राप्ति होती है।
पुण्यकाल में स्नान, ध्यान आदि धार्मिक कार्यो का विशेष महत्व होता है। मकर संक्रांति से देवताओं के लिए छह माह का दिन प्रारंभ होता है तो दैत्यों के लिए रात्रि का पहर शुरू हो जाता है। इस दिन से सूर्य की उत्तरायण गति आरंभ हो जाती है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने मकर संक्रांति पर्व पर तिल के प्रयोग को समझकर परंपरा का अंग बनाया है। आयुर्वेद के अनुसार यह शरद ऋतु के अनुकूल होता है।
मानव स्वास्थ की दृष्टि से तिल का विशेष महत्व बताया गया है। तिल दान करने से रोग, भय, कष्ट आदि से मुक्ति मिलती है। शनिवार को मकर संक्रांति के दिन होने से अति शुभ बताया गया है।
राशियों का प्रभाव : मकर संक्रांति को लेकर ग्रह-ग्रोचर एवं राशियों पर भी प्रभाव पड़ेगा।

मेष कष्टकारी
वृष धन का लाभ
मिथुन पीड़ा, भय
कर्क आंशिक लाभ
सिंह रोग, शोक
कन्या धन प्राप्ति
तुला शत्रु भय
वृश्चिक धन लाभ
धनु बंधन
मकर शोक, हानि
कुंभ शुभ कार्य
मीन सुख भोग


मकर संक्रांति के दिन पंतगबाजी का विशेष महत्व रहा है। प्राचीन समय से मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा चली आ रही है। आचार्य वैदिक के अनुसार धार्मिक ग्रंथों में भगवान राम ने भी मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाया था। रामचरित मानस के बालकांड में भगवान राम को पतंग उड़ाने की महिमा बताई गई है।
राम एक दिन चंग उड़ाई इंद्रलोक में पहुंची जाई।
जासु चंग असु सुंदरताई सो पुरुष जग में अधिकाई।
तिन सब सुनत तुरंत ही दीन्हीं छोड़ पतंग
खेंच लइ प्रभु वेग ही खेलत बालक संग।

रामचरित मानस की इस चौपाई को समझ लोग आज भी मकर संक्रांति के दिन बड़े उत्साह से गंगा किनारे पतंग उड़ाते नजर आते हैं।
 

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