शराबबंदी ने दिखाई नई राह,आदिवासी भित्ति कला को बचाने का अनूठा प्रयास

  • 12 Jan, 2017
  • Basu mitra

PATNA: मधुबनी पेंटिंग के तर्ज पर पारंपरिक आदिवासी भित्ति चित्रकला को सहेजने का बिहार के मधेपुरा में अनूठा प्रयास चल रहा है।बिहार में शराबबंदी के बाद प्रकृति से जुड़ा आदिवासी समुदाय अजीब बैचेनी के दौर से गुजर रहा था।

शराब उनके जिन्दगी का अहम हिस्सा थी। अवैध शराब का कारोबार करने वाले आदिवासियों के रोजगार खत्म होगया था जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव समुदाय की महिलाओं पर पड़ा था । जिन हाथों में कल तक शराब बनाने का सामान होता था , अब यही हाथ अपनी संस्कृति को संजोने के लिए आगे आये बढ़ रहे हैं।
आदिवासियों के इस लोक कला को संजोने  और  इन महिलाओं को नयी जिन्दगी देने के लिए मधेपुरा के ग्वालपाड़ा प्रखंड में नव ज्योति संस्था और कार्टूनिस्ट संजय ने अभिनव प्रयोग कर रहे हैं। आदिवासियों की भित्ति कला को दीवार से कैनवास पर उतारने के लिए उन्होंने ग्वालपाड़ा में आदिवासी महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें समाज के मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास कर रहें हैं। 

रोचक रहा सफर:
पेशे से पत्रकार और कार्टूनिस्ट संजय कुमार बताते हैं की पारिवारिक मजबूरियों के कारण पटना से वापस घर लौटना पड़ा। घर पहुँचने के बाद कुछ दिनों तक तय नहीं कर पाया की आगे क्या करना है। अक्सर आदिवासी टोलों से गुजरता था। उनके घरों के दीवार पर बने भित्ति चित्र मुझे आकर्षित करते थे। उसके बाद मैंने आदिवासी समाज में प्रचलित परंपराओं, पर्व-त्योहारों और उनकी जीवन शैली का गहराई से अध्ययन करना शुरू कर दिया। अध्ययन के दौरान मुझे लगा कि एक कलाकार के लिये इससे अनूठा अन्य कोई विषय नहीं हो सकता है।
शराबबंदी ने दिया नया अवसर :
संजय बताते हैं कि बिहार में शराबबंदी ने उन्हें अन्य अवसर प्रदान किया।शराबबंदी के कारण आदिवासी समुदाय में बेचैनी नजर आने लगी थी। अवैध शराब के धंधे पर आश्रित आदिवासियों के लिये यह किसी अभिशाप से कम नहीं था।मन में लगा कि आदि कला को मूर्त्तरुप देने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता। इस पूरे प्रयास को संस्थागत स्वरुप प्रदान करने के लिये आदि कला केन्द्र का गठन किया।
कई परेशनियों के बाद मिली सफलता :
हाशिये पर जीवन गुजार रहे आदिवासी समाज के लिये इस पहल के शुरूआत में लोगों के बीच उपहास का पात्र भी बना। 2 महीने के सतत प्रयास से रंगों से आकृति उभर कर सामने आने लगी। पेंटिंग का नामकरण भी हो गया। काफ़ी सोच-विचार के बाद आदि पेंटिंग पर सहमति बनी।
जल्द ही बड़े प्लेटफार्म पर लाने की तैयारी : 
संजय बताते हैं कि अभी तक सरकारी या किसी अन्य संगठनों से मदद की कोई पहल नहीं होने से थोड़ी निराशा हुई है। मन में यह तय कर लिया कि अपने बूते ही मंजिल तय करना है। पेंटिंग बेचने के लिये जगह-जगह प्रदर्शनी लगायी जायेगी। इसके साथ ही कला बाजार में आनलाइन बेचने की तैयारी भी चला रही है। जल्द ही आदिवासियों के इस भित्ति कला को लोगों तक पहुँचाने की कोशिश जारी है।
कपड़ा मंत्रालय ने दिखाई है रूचि:
आदिवासी कला को संजोने का प्रयास अब धीरे- धीरे रंग ला रहा है। संजय बताते हैं कि जिला प्रशासन को जब इसकी खबर मिली तो वहां इन महिलाओं का सम्मान किया गया। साथ ही कपड़ा मंत्रालय के हैंडीक्राफ्ट प्रमोशन ऑफिसर भुवन भास्कर ने भी इस कला को प्रमोट करने का आश्वासन दिया है।
 

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