मिडिल क्लास परिवारों के 'दंगल' को दर्शाती एक बेहतरीन फिल्म

  • 12 Jan, 2017
  • Ajay Shekhawat

RIMMI SHARMA: दंगल देखी। बढ़िया फिल्म, मजेदार डायलॉग और दमदार एक्टिंग वाली इस फिल्म में वो सबकुछ था जो एक संवेदनशील इंसान को गहरे तक छू जाए। बाप का बेटियों के साथ रिश्ता और बेटियों के साथ की तनातनी को बड़े ही बारीकी से छुआ है।

ये हर मिडिल क्लास की कहानी है। किसी ना किसी तरीके से हम सब ने अपने घरों में ऐसा ही कुछ देखा है। चाहे तो मां-बाप अपनी बेटी को बुलंदी पर जाने के लिए तैयार करते हैं या फिर उसे अपनी नाक का सवाल बनाकर निपटाने की फिराक में रहते हैं।

खैर दंगल को देखने के बाद एक बात जो मेरे दिमाग में कौंधती रही वो थी जन्म के बाद से और अपनी पूरी जिंदगी में अपने जीवन के लिए हम लड़कियों का नजरिया। जिंदगी जीने का तरीका और मन में दबा कर रखी अपनी अभिलाषाएं। कभी-कभी मुझे लगता है कि लड़कियों के जीन(gene) में ही कोई दिक्कत है। खासकर के भारत में पैदा हुई लड़कियों के। वो चाहे डॉक्टर, इंजीनियर, साइन्टिस्ट या किसी कंपनी की CEO ही क्यों ना बन जाएं, खुद को कभी मां-बाप, भाई, खानदान या पति की इज्जत होने से ऊपर सोच ही नहीं पाती।

डिग्री कोई भी ली हो, फैक्टरी सेंटिंग में आप वहीं रहती हैं। एक ‘सुसंस्कारी’, ‘पवित्र’ और आज्ञाकारी’ बेटी होने का लेबल लेने वाली। आपकी औकात नहीं है कि खुद के लिए सोच सकें। आप की हैसियत नहीं है कि खुद के लिए खड़े होकर कह सकें कि मैं अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहती हूं। आप में दम नहीं है कि आप इसलिए सांस लें ताकि आपको जीना है, आप सांस लेती हैं क्योंकि आप अपने बाप की, भाई की या पति की इज्जत हैं। आप सांस लेती हैं क्योंकि वो लोग चाहते हैं कि आप सांस लें। आप सांस लेती हैं क्योंकि आपको ये डर रहता है कि कही मेरे सांस ना लेने से वो लोग गुस्सा ना हो जाएं या उनका नाम न खराब हो जाए।


आपकी जिंदगी का हर कदम सिर्फ इस बात से तय होता है कि आप अपने परिवार की नाक कितनी ऊंची कर पाती हैं। दिक्कत ये है कि हम लड़कियां भी इस बात को अपने सीने से इस तरीके से लगा कर बैठी रहती हैं जैसे की अगर ये नहीं कर पाए तो मर ही जाना पड़ेगा। जिंदगी जीना तो छोड़िए मेरी कई दोस्त हैं जो अपनी मर्जी से फेसबुक पर स्टेटस अपडेट नहीं कर पातीं। हां ये और बात है कि उनकी रोल मॉडल मलाला जैसी लड़कियां हैं।

दबे मन में वो भी परिंदों की तरह आसमान में उड़ना चाहती हैं, पर एफबी पर फोटो तक डालने में उनके पसीने छूट जाते हैं। उनके मां-बाप उनकी शादी उसे ये भरोसा देकर करते हैं कि तुम्हारे ससुराल वाले तुम्हें आगे पढ़ाएंगे। हमने तुम्हें डॉक्टर, इंजीनियर जो बनाना था बना दिया है पर अब आगे की पढ़ाई वही कराएंगे। बेटी भी ये सोचकर कि मां-बाप के घर पर बैठकर उनकी तिरछी नजरों का सामना करने से अच्छा है शादी कर ही लेती हूं। लो जी कर ली शादी। अब शुरु हुआ असली खेल। मां बाप के राज में कम-से- कम फेसबुक पर कभी-कभार फोटो अपलोड कर लेते थे, एक-आधा स्टेटस अपडेट कर देते थे। अब वो भी गया।


ऐसा जरुरी नहीं वो किसी दबाव में ही ये कर रही है। पर अचानक से ये बदलाव सवाल तो खड़े करेंगे ही। और सोशल मीडिया का उदाहरण इसलिए की ये आज के टाइम में एक कनेक्टिंग लिंक बन चुका है। असली जीवन में आप क्या कर रहे हैं इसका अंदाजा नहीं लगा सकते पर कुछ तो समझ ही सकते हैं। आपका ड्रीम होता है कि जॉब करें और आज आप घर में बैठकर खाना बना रहीं हैं। ये है हमारी परवरिश। हमारा जीने का तरीका। अगर पसंद होता घर संभालना तो एक बात थी, पर आप तो नौकरी करना चाहती थीं! ये भी आज का ही सच है। आप अपने लड़की होने से ऊपर उठ ही नहीं पाए। सोच ही नहीं सकी की मैं अपनी जिंदगी जी लूं। देखेंगे, करेंगे, सब ठीक हो जाएगा यही कह-कहकर आपने खुद को बहलाना सीख लिया है।

इज्जत का सवाल है यार, लोग क्या कहेंगे ये भी तो सोचना है। जब तक ये सोच नहीं बदलेगी हम फिल्मों को ही देखकर सोचते रहेंगे कि मुझे भी ‘क्वीन’ फ्लिम की ‘रानी’ बनना है या फिर ‘दंगल’ की ‘गीता’ की तरह ही – मुझे मिसाल बनना है, क्योंकि मिसालें दी जातीं हैं, भूली नहीं जाती। बेटी पढ़ाओ से ज्यादा जरुरी है बेटियां खुद को पढ़ना सीख लें। तब ही सही मायने में बदलाव आएगा।

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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