बिहार के किसानों के लिए वरदान साबित होगा पेशाब, बनाया जाएगा ‘इको फ्रेंडली कीटनाशक’

PATNA : मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण होने का मूल कारण खेतों में अत्यधिक रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग को माना जा रहा है। इस बीच एक संस्था ने खगडिय़ा सहित सूबे के पांच जिलों में रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग को कम करने के उद्देश्य से मानव मूत्र को एकत्रित कर ‘इको फ्रेंडली कीटनाशक’ बनाया है। इसका प्रयोग भी किसान अपने खेतों में कर रहे हैं और उन्हें उत्पादन पर इसका सकारात्मक प्रभाव भी नजर आ रहा है। इससे किसान खुश हैं।  खगडिय़ा में जल विशेषज्ञ के उपनाम से मशहूर ‘समता’ संस्था के सचिव प्रेम वर्मा कहते हैं कि खगडिय़ा के अलावा सहरसा, सुपौल, मधुबनी और बेतिया में ‘इको फ्रेंडली कीटनाशक’ का प्रयोग शुरू किया गया है। संस्था ने एक विशेष प्रकार का शौचालय (फायदेमंद शौचालय) डिजाइन किया है।

इसमें मल अलग और मूत्र अलग एकत्रित किए जाने की व्यवस्था है। मूत्र का टैंक जब भर जाता है तो प्रति लीटर के हिसाब से उसे सात लीटर पानी में मिलाया जाता है। इसका छिड़काव फसल पर किये जाने से न सिर्फ कीट से मुक्ति मिलती है, अपितु फसल का उत्पादन भी बढ़ता है। समता के परियोजना समन्वयक  ब्रजभूषण झा कहते हैं कि लोग अपने ही मूत्र से घृणा करते थे और छूना नहीं चाहते थे। जब उनके एकत्रित मूत्र को हमने खुद पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव कर दिखाया तो उनकी झिझक खत्म हुई। महिलाएं व पुरुष एक साथ इसके लिए तैयार हो गए।

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ब्रजभूषण झा ने बताया कि फरवरी 2014 में जब हमने इसकी शुरुआत की, तो गांव-गांव जाकर लोगों को समझाया। लोग हमारी बातें सुनकर घृणा करते थे। हमने योग गुरु बाबा रामदेव आदि का उदाहरण दिया। तब जाकर किसान धीरे-धीरे तैयार हुए। समता के सचिव प्रेम वर्मा कहते हैं जिले के दो नदी पार दहमा खैरी खुटहा पंचायत के नेपाल टोला के किसान मनोज सदा, छोटकन सदा, विष्णुदेव सदा, मायाराम सदा, छट्टू  सदा, चैधा के योगेंद्र पासवान, प्रमोद पासवान आदि ‘इको फ्रेंडली कीटनाशक’ का प्रयोग कर रहे हैं। ये धान, कद्दू, करेला, झींगा, खीरा आदि की खेती में इसका प्रयोग अधिक करते हैं। इनके फसल का उत्पादन भी बढ़ा है।

खगडिय़ा के नेपाल टोला निवासी किसान सागर सादा कहते हैं कि जिस कद्दू में खाद और कीटनाशक प्रयोग किया, वह एक से डेढ़ फीट लंबा फलता है। जिसमें मूत्र से बने कीटनाशक का छिड़काव किया वह 2-3 फीट लंबा हुआ। हमें इससे काफी फायदा मिला है। कृषि विज्ञान केंद्र, खगडिय़ा के समन्वयक डॉ. ब्रजेंदु कुमार कहते हैं कि मूत्र में यूरिया, नाइट्रोजन, सोडियम, क्लोराइड, पोटेशियम, फॉस्फेट, अमोनिया के अलावा बहुत सारे तत्व होते हैं। इनसे फसल उत्पादन बढऩा तय है। संस्था ‘समता’ के सचिव प्रेम वर्मा मानेत हैं कि इस प्रयोग को सरकारी स्तर पर अपनाया जाना चाहिए। इससे स्वच्छता को तो बढ़ावा मिलेगा ही, मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाई जा सकेगी।

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