मिथिला पेंटिंग से सजाया जा रहा पटना का छठ घाट, दिन-रात एक कर कड़ी मेहनत करे हैं कलाकार

PATNA : पटना के घाट पर हमहु अरघिया देबै हे छठ मैया, हम ना जाइबै दोसर घाट देखब हे छठ मैया…इस बार पटना की छठ घाट को मिथिला पेंटिंग से सजाया जा रहा है। ताजा अपडेट के अनुसार क्राफ्टवाला राकेश कुमार झा के नेतृत्व में कलाकारों की टोली ने दिन रात एक कर दिया है। बताया जा रहा है कि कलेक्टेरियट घाट से लेकर दरभंगा हाउस तक लोग इस बार छठ के अवसर पर मिथिला पेंटिंग की छटा देख सकते हैं। कलाकारों की माने तो इस पेंटिंग से छठ घाट की सुंदरता में चार चांद लगने वाला है। वैसे तो पूरे बिहार में छठ के अवसर पर भीड़ उमड़ती है, लेकिन पटना की बात अलग है।

मधुबनी स्टेशन सहित कई ट्रेनों को पेटिंग से सजाया गया है : मिथिला पेंटिंग को लेकर एक आध साल से लोगों में काफी उत्साह देखा जा रहा है। मधुबनी स्टेशन को तो रातों रात कलाकारों ने श्रम दान कर मिथिला पेंटिंग से चमका दिया है। इतना ही नहीं इसके बाद दरभंगा स्टेशन सहित समस्तीपुर रेल मंडल के कई स्टेशनों पर मिथिला पेंटिंग बनाकर लोगों का ध्यान खींचा गया है। अभी हालहि की बात है दरभंगा से खुलने वाली संपर्क क्रांति और पटना से खुलने वाली राजधानी एक्सप्रेस को भी मिथिला पेंटिंग से सजाया गया है।

बताते चले कि मिथिला पेंटिंग बिहार के मिथला सहित नेपाल के मिथिला क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध है। अद्भुत शैली होने के कारण देश भर में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इस पेंटिंग को लोग पसंद करते हैं। पीएम मोदी ने तो कई बार इस पेटिंग की प्रशंसा की है। कब मनाया जाता है छठ पूजा का पर्व : सूर्य देव की आराधना का यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल षष्ठी व कार्तिक शुक्ल षष्ठी इन दो तिथियों को यह पर्व मनाया जाता है। हालांकि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाये जाने वाला छठ पर्व मुख्य माना जाता है। कार्तिक छठ पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व को छठ पूजा, डाला छठ, छठी माई, छठ, छठ माई पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा आदि कई नामों से जाना जाता है।

क्यों करते हैं छठ पूजा : छठ पूजा करने या उपवास रखने के सबके अपने अपने कारण होते हैं लेकिन मुख्य रूप से छठ पूजा सूर्य देव की उपासना कर उनकी कृपा पाने के लिये की जाती है। सूर्य देव की कृपा से सेहत अच्छी रहती है। सूर्य देव की कृपा से घर में धन धान्य के भंडार भरे रहते हैं। छठ माई संतान प्रदान करती हैं। सूर्य सी श्रेष्ठ संतान के लिये भी यह उपवास रखा जाता है। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये भी इस व्रत को रखा जाता है।

कौन हैं देवी षष्ठी और कैसे हुई उत्पत्ति : छठ देवी को सूर्य देव की बहन बताया जाता है। लेकिन छठ व्रत कथा के अनुसार छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। देवसेना अपने परिचय में कहती हैं कि वह प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि मुझे षष्ठी कहा जाता है। देवी कहती हैं यदि आप संतान प्राप्ति की कामना करते हैं तो मेरी विधिवत पूजा करें। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को करने का विधान बताया गया है। पौराणिक ग्रंथों में इस रामायण काल में भगवान श्री राम के अयोध्या आने के पश्चात माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करने से भी जोड़ा जाता है, महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना से पुत्र की प्राप्ति से भी इसे जोड़ा जाता है।

सूर्यदेव के अनुष्ठान से उत्पन्न कर्ण जिन्हें अविवाहित कुंती ने जन्म देने के बाद नदी में प्रवाहित कर दिया था वह भी सूर्यदेव के उपासक थे। वे घंटों जल में रहकर सूर्य की पूजा करते। मान्यता है कि कर्ण पर सूर्य की असीम कृपा हमेशा बनी रही। इसी कारण लोग सूर्यदेव की कृपा पाने के लिये भी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करते हैं।

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