मिथिलांचल की बेटी डॉ. चित्रलेखा अंशु ने महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए समर्पित किया जीवन

Patna: बिहार के मधुबनी जिले की मिथिलांचल की बेटी डॉ. चित्रलेखा अंशु ने मिथिला जैसे पिछड़े क्षेत्र में, महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। डॉ. चित्रलेखा अंशु ने शिक्षा को ही अपना हथियार बना कर आज सभी वर्ग की महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए एकजुट करने में लगी हुई है।

मधुबनी के शिविपट्टी निवासी अमरनाथ झा व आशा देवी की सबसे बड़ी संतान डॉ. चित्रलेखा अंशु ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दरभंगा से ही पूरी की। जिसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र के वर्धा स्थित प्रतिष्ठित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय से महिला अध्ययन में स्नातकोत्तर किया और यहीं से उन्होंने पीएचडी भी की है। फिलहाल वे नई दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ जेंडर एंड डेवलपमेंट के अंतर्गत रिसर्च कर रही है।

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तो वहीं डॉ. चित्रलेखा अंशु जी को वर्ष 2018 के अक्टूबर माह में शारदीय नवरात्रा के दौरान ही डॉ. चित्रलेखा को यहां महिला अध्ययन में एम.फिल के लिए गोल्ड मेडल भी मिल चुका है। गोवा की राज्यपाल मृदुला सिंहा के हाथों गोल्ड पाकर डॉ. चित्रलेखा के हौसलों को और बल मिला। मिथिला की दलित महिलाओं के संदर्भ में मैथिली लोकगीतों के द्वारा सांस्कृतिक प्रतिरोध पर इस रिसर्च के लिए डॉ. चित्रलेखा को इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस एंड रिसर्च (आइसीएसएसआर) से दो साल का पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप भी मिला है।

डॉ. चित्रलेखा अंशु जी का कहना है कि आज नारी सशक्तीकरण पर काफी जोर दिया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता में अभी भी खासकर ग्रामीण क्षेत्र व दलित समाज में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। इस दिशा में काफी कार्य करने की जरूरत है। डॉ. चित्रलेखा ने कहा कि महिलाओं के विकास के लिए सबसे पहले महिलाओं को ही आगे आना होगा। कहा कि दलित महिलाओं के पास अभी भी अपना विरोध जताने का कोई हथियार नहीं है। ऐसे में ये महिलाएं लोकगीतों के माध्यम से ही अपनी पीड़ा को बयां करती आईं हैं। जब तक महिलाएं अपने अधिकार के लिए एकजुट नहीं होंगी, पुरूष प्रधान समाज की सोच को चुनौती देना एवं उसमें बदलाव करना उतना आसान नहीं होगा।