चुनावी बतकही : सीट बंटवारे में जो झोल दिख रहा है, उस पर गाम-घर में चर्चा का बाजार गरम है

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PATNA : लोकसभा चुनाव को लेकर बतकही शुरू है। हर कोई इलेक्शन-एक्सपर्ट की तरह बात कर रहा है। जदयू और भाजपा के उम्मीदवारों को लेकर रंग-बिरंग की बातें सुनने को मिल रही है। दरसअल सीट बंटवारे में जो झोल दिख रहा है, उस पर गाम-घर में चर्चा का बाजार गरम है।

फिलहाल मक्का में पटवन का वक्त है , ऐसे में खेत में भी चुनावी लीला पर ही बातचीत जारी है। गाम के गोरख का सवाल है कि नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी एक्के पार्टी का है क्या? फिर वो बताता है कि नीतीश ने एक बार गाम के लोगों को रेडियो दिया था। उसने बताया- ” बहुत लोगों ने रेडियो मिलते ही उसे बेच दिया , चायपत्ती-चीनी के लिए और जिनके पास है , वे रेडियो पर मोदी जी की मन की बात वाला भाषण सुनते हैं।”

गोरख जैसे लोगों की बातों को सुनकर लगा कि राजनीति को आप कई कोणों से देख सकते हैं। सरकारी तंत्र का जाल किस तरह से बुना जाता है यह भी एक कहानी है। पूर्णिया-अररिया सीमा पर एक महादलित टोले में नरेंद्र-नितीश के साथ-साथ राहुल गांधी की भी चर्चा हुई। लोगबाग को अबतक यह पता नहीं चल पा रहा है कि उसके संसदीय क्षेत्र से सांसद का चुनाव कौन लड़ेगा, ऐसे में लोगबाग बस मोदी-राहुल गांधी और पाकिस्तान की ही बात कर रहे हैं। यह अजीब लग रहा है कि स्थानीय मुद्दे, जरूरत, विकास आदि की बात कोई नहीं कर रहा है। हां, जाति पर खूब बात हो रही है।

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महादलित टोले में एक बुजुर्ग महिला से बात हुई। वह अचानक इंदिरा गांधी की बात करने लगी और इसी बीच पूछ बैठी – “नरेंदर मोदी क देखने छी अहाँ? सुनैत छिये कि बड़ जोर से गरज गरज क बजैत छै! लालू क त हम देखने छिये एक बैर रानीगंज में, लेकिन ऊ खाली हंसबे छै। नितीश कुमार बढियां बाजैत छै।”

चुनावी बतकही करते हुए उन लोगों की भी बातचीत सुनता हूँ जो चुनावी ड्यूटी पर जाएंगे। मतदान ड्यूटी पर जाने वालों की जिला मुख्यालय में ट्रेनिंग शुरू हो चुकी है। चुनाव ड्यूटी में लगने वाले हमारे एक मित्र बताते हैं कि ट्रेक्टर और टार्च के बिना कोई भी चुनाव कर्मी का ‘चुनावी जीवन’ अधूरा लगता है। वहीं दियारा के इलाके में ‘नाव और घोड़े’ के बिना पुलिस कर्मी का काम अधूरा होता है।

न्यूज़ चैनल और पार्टी दफ्तरों से दूर गाम-घर की बस्तियों की चुनावी चर्चा कुछ अलग होती है , हालांकि स्मार्ट फोन और टेलीविजन की वजह से उनतक सारी बातें पहुँचने लगी है। वैसे यह अलग बात है कि उन तक कौन सी बात पहुंचे यह तय राजनीतिक दल ही कर रहे हैं, डिजिटल और टेलीविजन की दुनिया के माध्यम से।
लेखक : गिरिंद्रनाथ झा, वरिष्ठ पत्रकार(यह आलेख मूल रूप से उनके फेसबु वॉल पर प्रकाशित की गई है)