इस ईमानदार बिहारी नेता के सामने जीरो हैं पीएम मोदी, जीते जी दान कर दी अपनी सारी संपत्ति

PATNA : बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह सादगी, ईमानदारी और कर्मठता के प्रतीक थे। उन्हें आधुनिक बिहार का निर्माता माना जाता है। इसी वजह से उन्हें ‘बिहार केसरी’ कहा जाता है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी उनकी कार्यकुशलता और कर्मठता के कायल थे। ब्रिटिश शासन काल में 1946 में जब बिहार प्रांतीय सभा के चुनाव हुए तो श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हुए थे।आजादी के बाद भी वे इस पद पर बने रहे। 1952 के पहले विधानसभा चुनाव और 1957 के दूसरे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विजय मिली थी और दोनों बार श्रीकृष्ण सिंह ही मुख्यमंत्री बने थे। 1961 में उनका निधन हो गया।

यानी वे 1946 से 1961 तक कुल 15 साल तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। आम तौर पर अगर कोई व्यक्ति 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे तो यही समझा जाता है कि आर्थिक रूप से वो मजबूत स्थिति में होगा। लेकिन डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने इस मामले में एक अलग मिसाल पेश की थी। यह जानना दिलचस्प होगा कि 15 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद उनके पास कितना पैसा जमा था। एक मुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्ण सिंह ने जो आदर्श प्रस्तुत किया पूरे भारत में उसकी मिसाल नहीं है। उन्होंने जीते जी अपनी सम्पत्ति का वसीयत कर दिया था।

1961 में जब उनका निधन हुआ तो वसीयत के मुताबित तीन सदस्यीय समिति ने उनकी तिजोरी को खोला था। लाइव बिहार की रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन कार्यवाहक मुख्यमंत्री दीप नारायण सिंह, समाजवादी और सर्वोदय के नेता जयप्रकाश नारायण और तत्कालीन मुख्यसचिव एस जे मजुमदार ने श्री बाबू की तिजोरी को खोला। उस तिजोरी में कुल 25 हजार रुपये मिले। श्री बाबू ने यह निर्देश दिया था कि 25 हजार रुपये में से 22 हजार रुपये कांग्रेस पार्टी को दान दे दिया जाए। श्री बाबू का मानना था कि कांग्रेस का सदस्य होने की वजह से ही उन्हें सीएम पद पर रहने की प्रतिष्ठा मिली।

इस वजह से उनके धन पर सबसे अधिक पार्टी का अधिकार है। श्री बाबू ने इसमें से दो हजार रुपये अपने राजनीतिक मित्र शाह उजेर मुनीमी के पुत्र को देने का निर्देश दिया था। उस समय शाह उजेर के पुत्र को पैसों की सख्त जरूरत थी। बाकी बचे एक हजार रुपये को उन्होंने अपने राजनीति सहयोगी महेश प्रसाद सिंह की पुत्री की शादी में उपहार देने के लिए कहा था। श्री बाबू ने अपनी सार्वजनिक जीवन की कमाई में से अपने पुत्रों को एक पैसा नहीं दिया। इतना ही नहीं श्री बाबू जब तक मुख्यमंत्री रहे उन्होंने सीएम आवास में अपने परिवार के किसी सदस्य को नहीं रखा। जब तक श्री बाबू जीवित रहे उन्होंने अपने पुत्रों को राजनीति में भी नहीं आने दिया।

श्री बाबू निधन के बाद ही उनके पुत्र बंदी शंकर सिंह विधायक और मंत्री बन पाये थे। श्री बाबू सम्पन्न किसान परिवार से आते थे। इस पैतृक सम्पत्ति से ही उनके पुत्रों को संतोष करना पड़ा। मुख्यमंत्री हो कर भी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने जो आदर्श प्रस्तुत किया वो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी नहीं कर पाये। नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए कई वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज कर दिया था जब कि श्री बाबू ने जीते जी अपने पुत्रों को चुनावी राजनीति में नहीं आने दिया। श्री बाबू को अपने कर्म पर विश्वास था। उनका मानना था कि सरकार के कामकाज पर जनता वोट देती है। अगर जनता की नजर में उनका काम ठीक होगा तो वोट अपने आप मिल जाएगा। इसी सोच के कारण वे अपने चुनाव क्षेत्र में प्रचार करने के लिए नहीं जाते थे।

हमेशा उनके आत्मविश्वास की जीत हुई। जनता ने उन्हें हर बार विजयी बनाया। श्री बाबू कांग्रेस के नेता थे लेकिन कर्मठता की वजह से दूसरे दल के नेता बी उनका बहुत सम्मान करते थे। विख्यात समाजवादी चिंतक मधुलिमये ने अपनी किताब ’समाजवाद के पचास बरस’ में लिखा है कि डॉ. श्रीकृष्ण सिंह को यह श्रेय अवश्य मिलना चाहिए कि उन्होंने अपने शासन काल में अमेरिका कि टिनेसी घाटी की तरह बिहार,बंगाल के हित के लिए दामोदर घाटी योजना बनायी । इस योजना से बिहार के विकास का रास्ता खुला।

The post इस ईमानदार बिहारी नेता के सामने जीरो हैं पीएम मोदी, जीते जी दान कर दी अपनी सारी संपत्ति appeared first on Mai Bihari.