रंजिता रंजन के लिए मुश्किल होगा चुनाव जीतना, सुपौल से हार सकती है कांग्रेस, NDA का पलड़ा भारी

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PATNA : लोक सभा चुनाव को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी है। सीटिंग कैंडिडेट लगभग मानकर चल रहे हैं कि उनका टिकट पक्का है। भले एनडीए और महागठबंधन में उम्मीदवार और सीटों की घोषणा ना हुई हो लेकिन चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी है। लाइव बिहार ग्राउंड रिपोर्ट की इस प्रथम श्रृंखला में सुपौल लोकसभा सीट का वर्तमान स्थिति बताने जा रही हैं।

बिहार के कई हाई – प्रोफाइल लोकसभा सीट में से एक सीट है सुपौल का जो 2009 में अस्तित्व मे आया इससे पहले यह क्षेत्र मधेपुरा सहरसा और अररिया लोकसभा का हिस्सा हुआ करता था। सुपौल लोकसभा सीट इसलिए भी हाई-प्रोफाइल सीट मानी जाती है क्योंकि एक समय में पटना से लेकर दिल्ली तक इस धरती के राजनेता ललित नारायण मिश्र, लहटन चौधरी एवं जगरनाथ मिश्र की धमक महसूस की जाती थी। जो जगह बाद के वर्षों में बिहार सरकार में मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव ने ली जो फिलहाल बिहार सरकार में जदयू कोटे से उर्जा मंत्री हैं।

वही यहां कि सांसद कांग्रेस नेत्री रंजीत रंजन बहुचर्चित नेता पप्पू यादव की पत्नी हैं साथ ही कांग्रेस के रष्ट्रीय सचिव सह राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं।
सुपौल लोकसभा के अंतर्गत छः विधानसभा सीट आती है। वर्तमान में जिसमे से चार पर जदयू एवं एक-एक सीट पर राजद भाजपा के विधायक हैं। 2009 में अस्तित्व में आई इस लोकसभा के प्रथम सांसद के रूप मे जदयू के विश्वमोहन कुमार मंडल ने जीत हांसिल की जिसने कांग्रेस उम्मीदवार रंजीत रंजन को 166075 वोट के बड़े अंतर से चुनाव मे हराया।

2009 के चुनाव मे जदयू एवं भाजपा के अलवा राजद एवं लोजपा ने साथ-साथ चुनाव लड़ा। जबकि कांग्रेस अकेले चुनाव मैदान मे उतरी। उस परिस्थिति मे जदयू उम्मीदवार विश्वमोहन कुमार ने 313677 (44.96%)वोट प्राप्त किया। जबकि रंजीत रंजन ने 147602 (21.16%) एवं लोजपा उम्मीदवार सुर्यनारायण यादव ने 93094 (13.34%) वोट प्राप्त किया।

वहीं 2014 के मोदी लहर में इस संसदीय सीट के चुनाव परिणाम ने पुरे देश के राजनीतिक पंडितो को चौंकाया और यहां से कांग्रेस उम्मीदवार रंजीत रंजन ने अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी जदयू के दिलैश्वर कामैत को 59672 वोट के अंतर से हराकर सांसद बनी। इस चुनाव में जहां कांग्रेस-राजद एवं भाजपा-लोजपा साथ-साथ चुनाव लड़ी थी वहीं जदयू अकेले चुनावी मैदान में उतरी थी। आंकडे के मुताबिक कांग्रेस प्रत्याशी रंजीत रंजन को 332927 (34.30%) वोट जबकि जदयू प्रत्याशी दिलेश्वर कामैत को 273255 (28.15%) वोट एवं भाजपा प्रत्याशी कामेश्वर चौपाल को 249693 (25.73%) वोट हांसिल हुआ।

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आंकडों के विश्लेषण से स्पष्ट पता चलता है कि 2014 में भजपा और जदयू के वोट बंटवारे का सीधा फायदा कांग्रेस प्रत्याशी रंजीत रंजन को मिला लेकिन बदले हुए राजनीतिक परिस्थितियों मे कांग्रेस के लिए ये सीट जीतना आसान नहीं होगा। कारण भाजपा जदयू साथ आ गयी है और उन दोनों का वोट प्रतिशत अगर आप जोड़ दे तो कांग्रेस के वोट प्रतिशत से लगभग 20% अधिक होती है। जातीय समीकरण के मुताबिक यह सीट पचपनिया (अतिपिछड़ा) बाहुल्य सीट माना जाता है लेकिन यादव ब्राह्मण और मुसलमानों की भी आवादी यहां ठीक-ठाक संख्या मे है। रजनीतिक हलके मे चर्चा के मुताबिक NDA में ये सीट जदयू कोटे मे जाने की संभावना है वही महागठबंधन मे ये सीट कांग्रेस को तय माना जा रहा है।

जदयू से जिन नामों की चर्चा है उनमे दिलेश्वर कामैत , उर्जा मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव एवं विधान परिषद के उपसभापति हारूण रशिद का नाम लिया जा रहा जबकि कांग्रेस से रंजीत रंजन का टिकट लगभग तय है। वहीं यदि ये सीट NDA में भाजपा कोटे में जाती है तो उनके उम्मीदवार विश्वमोहन कुमार मंडल या छातापुर भाजपा विधायक नीरज कुमार सिंह उर्फ बब्लू सिंह हो सकते हैं ।

यदि पिछले दो लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के वोटिंग ट्रेंड को देखेंगे तो इस लोकसभा सीट पर गैर यादव पिछडे वर्ग के मतदाता जहां NDA के साथ नज़र आते हैं वही यादव एवं मुसलमान कांग्रेस- राजद के साथ नजर आता है जबकि दलितो के वोट का अधिकांशतः भाग NDA को जाता है और ब्राह्मणों का वोट लगभग बराबर हिस्से मे कांग्रेस और NDA गठबंधन को मिलता है। बदली हुई राजनैतिक परिस्थिति में कांग्रेस के लिए ये सीट बचाना आसान नही होगा लेकिन राजनीति मे हर बार 2+2=4 ही नही होता है कभी-कभी तीन और पांच भी होता है। यू तो अपने विरोधियों की तुलना मे कांग्रेस सांसद बहुत अधिक लोकप्रिय हैं लेकिन आमने- सामने की लड़ाई में जीतने वाले उम्मीदवार को कम से कम पांच लाख वोट की आवश्यकता होगी जो पिछले चुनाव की तुलना में कांग्रेस के लिए दो लाख अधिक है बांकि चुनावी उंट किस करवट बैठता है ये तो समय बतायेगा।
लेकखक : कृष्ण कुमार मिश्रा, सुपौल

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