सोनपुर मेला का इतिहास, नौटंकी की नामी-गिरामी हस्तियों से थियेटर की बार बाला तक का सफर

PATNA :  सोनपुर के मेले की बात हो और थियेटर की बात ना हो, तो कुछ अधूरा-सा लगता है। लेकिन आज हम जिस थियेटर की बात करते हैं वो मेले की परंपरा रही थियेटर की नौटंकी का विकृत रूप है, जिसे अश्लीलता से जोड़कर देखा जाता है।  अगर आपको फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास मारे गए गुलफाम पर बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ और उसका हीरामन और सर्कस में लगे थियेटर की नर्तकी हीराबाई याद हो तो वही गांव के मेले का माहौल और वही थियेटर की नौटंकी है सोनपुर मेले के थियेटर की भी कहानी।

नौटंकी का बिगड़ा रूप है थियेटर : सोनपुर में थियेटर की शुरूआत कब हुई थी, यह कहना मुश्किल है। पहले एक महीने तक चलने वाले इस सोनपुर मेले में दूर-दराज के गांव से आए लोगों के मनोरंजन के लिए थियेटर लगाए जाते थे और रात भर नाच-गाना चलता था और लोगों का स्वस्थ मनोरंजन होता था। लेकिन,धीरे-धीरे इसने अश्लीलता का रूप ले लिया और आज बार गर्ल्स का भोंडा,अश्लील नाच ही इस थियेटर की पहचान बन गई है। आजकल जिस थियेटर की चर्चा होती है, वह नौटंकी का बिगड़ा हुआ रूप है। मेले में पहले नौटंकी लगती थी। जिसमें कलाकार किसी कथा पर अभिनय के साथ नाचते थे और लोगों का मनोरंजन करते थे। पहले इस मेले में रामलीला भी होती थी।

sonpur mela
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शुरूआत से ही है थियेटर या नौटंकी की परंपरा : वैसे इस मेले में थियेटर का आना कोई नई बात नहीं है। प्राचीन काल से लगने वाले इस मेले में थियेटर का भी अपना इतिहास रहा है। हरिहर क्षेत्र के लोगों का मानना है कि मेले में थियेटर की परंपरा प्रारंभ से है। इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे और रात मेले में ही गुजारते थे और फिर जरूरत के सामान की खरीदारी कर वापस लौट जाते थे।  मेले में मिठाई और खिलौनों की दुकान चलाने वाले स्थानीय बुजुर्ग दीनानाथ सिंह बताते हैं कि वर्ष 1909-10 के पूर्व पारसी थियेटर ददा भाई ढ़ूढी की कंपनी आया करती थी। इस कंपनी में सोहराब, दोहराब जी, हकसार खां जैसे कलाकार होते थे। इसके बाद कोई नामी-गिरामी कंपनी इस मेले में तो नहीं आई, लेकिन मेले में नौटंकी बराबर होती रहती थी।

बड़ी-बड़ी कलाकार आती थीं नौटंकी में : दीनानाथ सिंह बताते हैं कि वर्ष 1934-35 में मोहन खां की तीन नौटंकी कंपनी मेले की रौनक हो चली थी। इस कंपनी में गुलाब बाई और कृष्णा बाई जैसी मंजी हुईं कलाकार होती थीं, जिन्हें देखने के लिए पूरे राज्यभर से लोग आते थे। उस दौरान यह मेला ठुमरी अैर दादरा के बोल से गुलजार रहता था। यही कारण है कि नौटंकी की परंपरा इस मेले की पहचान बन गई । उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे मेले में अश्लीलता घर कर गई और गांव-गिरांव के अलावे शहर के लोग भी मेले में आने लगे और थियेटर का रूप बदल गया। अब नौटंकी नहीं, इसकी जगह देह प्रदर्शन कर पैसे कमाने का धंधा चलने लगा। हर साल यहां पांच से छह थियेटर कंपनियां आती हैं। प्रत्येक कंपनियों में 50 से 60 युवतियों का दल दर्शकों का मनोरंजन करता है। एक कलाकार ने कहा, “थियेटर में अब पहली वाली बात नहीं रही। मेला लगाने की यह परंपरा पुरानी है, जिसका निर्वहन किया जा रहा है। आधुनिकता के इस दौर में न तो पहले की तरह गायन मंडलियां हैं और न ही वैसे वादक हैं। नौटंकी की सुसंस्कृत परंपरा भी समाप्त हो गई है।”

थियेटर में अश्लीलता घर कर गई : जो भी हो, ऐतिहासिक सोनपुर मेला आज भी सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कहने को तो यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है लेकिन यहां आने वाले सैलानियों का आकर्षण नौटकी कंपनियों की बालाएं भी होती हैं। आने वाले इन बालाओं के मनमोहक नृत्य एवं शोख अदाओं के लोग आज भी मुरीद हैं।

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उत्तर वैदिक काल में ही हुई सोनपुर मेले की शुरूआत : ‘हरिहर क्षेत्र मेला’ और ‘छत्तर मेला’ के नाम से भी जाने जाना वाला सोनपुर मेले की शुरुआत कब से हुई इसकी कोई निश्चित जानकारी तो उपलब्ध नहीं है, परंतु यह उत्तर वैदिक काल से माना जाता है। हाजीपुर आर. एन कॉलेज से अवकाश प्राप्त प्रोफेसर नवल किशोर श्रीवास्तव कहते हैं कि ह्वेनसांग के यात्रा वृतांतों में भी इस हरिहर क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। उन्होंने बताया, ‘एक जमाने में यह मेला जंगी हाथियों का सबसे बड़ा केंद्र था। मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य, मुगल सम्राट अकबर और 1857 के गदर के नायक वीर कुंवर सिह ने भी से यहां हाथियों की खरीददारी की थी।’

मेले के इतिहास के बारे में हाजीपुर के ज्योति निराला बताते हैं कि इस मेला का वर्णन वराह पुराण में भी है। यहां मुद्रा के प्रचलन के पहले से मेला लग रहा है। पहले लोग सामान की अदला-बदली कर खरीद बिक्री करते थे। सोनपुर के आसपास की जमीन उर्वर है। किसान यहां अपने अनाज लेकर आते और पशु व खेती में इस्तेमाल होने वाले औजार खरीदकर ले जाते।  सोनपुर मेला कभी गंडक के दोनों किनारे पर लगता था। हाजीपुर के हथसार, नखास और बिद्दुपुर तक मेला लगता था। गंडक के दोनों किनारे हाथी बांधे जाते थे। मेला में ईरान और मुल्तान के व्यापारी अरबी घोड़े लेकर आते थे।

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