जेल में नर्सों संग फोटो खींचवाकर फंसे लालू, जज बोले- फोटो देखकर नहीं लगता वे बीमार हैं 

जेल में नर्सों संग फोटो खींचवाकर फंसे लालू, जज बोले- फोटो देखकर नहीं लगता वे बीमार हैं 

By: Sudakar Singh
March 25, 04:38
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Live Bihar Desk: लालू प्रसाद को कोर्ट की अनुमति के बगैर रिम्स भेजने पर जज शिवपाल सिंह ने जेल अधीक्षक को शोकॉज किया है। एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है। नोटिस में कहा है कि अन्य आरोपियों को जेल से रिम्स भेजने से पहले कोर्ट से अनुमति लेते हैं, तो फिर लालू के मामले में क्यों नहीं। लालू प्रसाद का नर्सों से घिरे फोटो पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि नहीं लगता है कि उनकी तबीयत खराब है। नर्स के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं।

 
जज शिवपाल सिंह ने कहा कि आरोपी लालू प्रसाद ने गरीब परिवार में जन्म लिया था। लेकिन जब राजनीति में प्रवेश किया तो उन्होंने पशुपालन समेत अन्य विभागों में भ्रष्टाचार की नदियां बहा दीं। राज्य सरकार अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पा रही थी। वे लोग आधे वेतन पर काम करने को मजबूर थे। लेकिन लालू ने अवैध तरीके से काफी संपत्ति अर्जित की और एक क्षेत्रीय पार्टी बना डाली। खुद सर्वेसर्वा बन गए। हाईकोर्ट के आदेश के बाद लालू ने मुख्यमंत्री की कुर्सी जरूर छोड़ी, लेकिन अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया।

 
उन्होंने कहा कि राजनीतिक प्लेटफॉर्म की बदौलत उन्होंने आपराधिक मामलों की सुनवाई में बाधा पहुंचाई, जिससे लगातार 20 साल तक मामला लंबित रहा। वह अपनी राजनीतिक शक्ति का आनंद लेते रहे। हालांकि सीबीआई ने 11 मई 2000 को ही अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया था। लेकिन लालू सांसद भी बने, रेलमंत्री भी। लालू मार्च 1992 से जुलाई 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री रहे। निगरानी के तत्कालीन आईजी डीपी ओझा, जिन्हें बाद में प्रोन्नत कर बिहार का डीजीपी बना दिया, ने कभी भी निगरानी कांड संख्या 34/1990 में रुचि नहीं ली। 


जज ने कहा कि गवाहों के बयान से स्पष्ट है कि डीपी ओझा ने लालू के कहने पर विधु भूषण द्विवेदी की ओर से दिए आवेदन में से लालू का नाम मिटा दिया था। लालू ने संविधान की शपथ जरूर ली थी, लेकिन इसकी गरिमा का ध्यान नहीं रखा। उन्होंने मामले के सहयोगी आरोपी आरके दास, श्याम बिहारी सिन्हा का सेवा विस्तार कर दिया, जो नियम के विपरीत था। लालू ने चिट्‌ठी लिखकर आरोपी रामराज राम को पशुपालन विभाग का निदेशक बना दिया। हालांकि पटना हाईकोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। लेकिन लालू मार्च 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बने और हाईकोर्ट के आदेश का कभी भी पालन नहीं किया। मुख्यमंत्री रहते स्वीकृत राशि से कई गुणा अधिक की निकासी की गई है। 
 

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