पुण्यतिथि पर देश के पूर्व पीएम लालबहादुर शास्त्री को शत-शत नमन, सदैव आपका ऋणी रहेगा भारत

PATNA : आज भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि है। इंडिया-पाकिस्तान के लड़ाई में जीत के बाद समझौता करने गए ताशकंद से आज ही के दिन 1966 में उनकी मौत की खबर आई थी।

वो कुल दो सालों के लिए ही प्रधानमंत्री रहे किंतु उनके किए काम और उनका सादगीपूर्ण ईमानदार क्षवि आज भी जनता को उनसे जोड़कर रक्खी है। स्वभाव और दिखने में सरल-सौम्य शास्त्री जी इच्छाशक्ति और निश्चय में दृढ़ थे। तब अपने देश मे अन्न की कमी होती थी और गेंहू कम उपजता था, जब अमरीका ने गेंहू देने से मना कर दिया तो शास्त्री जी ने देश मे हरित-क्रांति की नींव डाली। देश मे अन्न की कमी के दौर में एक वक्त ऐसा भी आया जब गांधीवादी शास्त्रीजी ने केवल एक वक्त भोजन करने का निश्चय किया। जब पाकिस्तान ने 1965 में आक्रमण किया तो न केवल दृढ़ता से सामना किया बल्कि सम्पूर्ण शक्ति जुटाकर उसे हराया भी।

नेहरू जी के दौर में जब कामराज कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो पुराने क्षत्रपों और लीडर्स को ठिकाने लगाने के लिए उन्होंने देश के छह राज्यों के कांग्रेसी मुख्यमंत्रीयों का इस्तीफा ले लिया, ताकि इंदिरा जी के लिए राह बने। जब नेहरू का देहावसान हुआ तो नए प्रधानमंत्री के लिए शास्त्रीजी को सरल-सज्जन समझकर प्रधानमंत्री के लिए आगे किया गया और सरकार में एंट्री के लिए इंदिरा जी को इन्फॉर्मेशन और ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्टर बनाया गया। लेकिन राजनीति में सौम्य-सज्जन शास्त्रीजी प्रधानमंत्री के अपने दायित्वों के प्रति हमेशा अडिग रहे और कर्मठता से कर्तव्यों का पालन किया।

पाकिस्तान से लड़ाई जितने के बाद जब भारतीय सेना लाहौर की तरफ बढ़ी जा रही थी तो वैश्विक दवाब के बाद समझौता के लिए शास्त्रीजी को ताशकंद बुलाया गया और वही समझौता के अगले ही दिन उनकी मौत की खबर आई। उनके मौत के बारे में अनेक बातें हुईं पर कभी सही कारण सामने नहीं आ सका। लोग कहते हैं की उनकी हत्या हुई थी और उसके कुछ सबूत थे जिसकी कभी जांच नहीं हो सकी और न ही शास्त्री जी के शव का पोस्टमार्टम हो सका। कुछ लोगों का मत है की शास्त्रीजी की मौत अमेरिकन खुफिया एजेंसी सीआईए के इशारे पर हुई लेकिन पुख्ता सच कभी सामने नहीं आ पाया। शास्त्रीजी ने अपने मौत से कुछ दिनों पहले यह घोषणा की थी होमी जहाँगीर भाभा के नेतृत्व में भारत जल्द ही परमाणु-परीक्षण कर लेगा। होमी भाभा ने एटॉमिक एनर्जी एस्टेब्लिशमेंट ट्रोम्बे, AEET (अब भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर, BARC) की स्थापना की थी, वर्षों से परमाणु-परीक्षण पर काम कर रहे थे और बेहद नजदीक थे।

इससे अमेरिका और दुनिया के बांकी परमाणु सम्पन्न देश खफा चल रहे थे और भारत के इस प्रयास को रोकना चाहते थे। ताशकंद में शास्त्री जी के मृत्यु के ठीक तेरहवें दिन बाद 24 जनवरी को एक कॉन्फ्रेंस के लिए जा रहे होमी जहाँगीर भाभा की मौत एक प्लेन-हादसे में हो गई। बाद में रॉबर्ट क्रौली नाम के एक पूर्व सीआईए अधिकारी ने इस संबंध में कहा था की भाभा और शास्त्री की मौत केवल एक हादशा नहीं थी। ख़ैर इन दोनों के मौत का राज कभी खुलकर सामने तो नहीं आ पाया किंतु इनदोनों के मौत से इंडियन न्यूक्लियर प्रोग्राम कुछ सालों के लिए पीछे जरूर चला गया। बाद में 8 साल बाद 1974 में भारत ने पोखरण-I टेस्ट किया। शास्त्री जी के पुण्यतिथि पर देश के झोली के लाल और बहादुर सपूत श्री शास्त्रीजी को श्रद्धांजलि।

लेखक : आदित्य मोहन, MSU

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