विश्लेषण : भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का कितना फायदा उठा पायीं हैं सत्ताधारी पार्टियाँ?

PATNA : लोकसभा चुनाव में बस चंद महीने रह गए हैं। कुछ महीनें पहले तक केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार बैकफुट पर थी। राफेल डील पर राहुल गाँधी के नेतृत्व में सारा विपक्ष नरेंद्र मोदी को सीधे सीधे चोर कह रहा था। GST की वजह से व्यापारी वर्ग में नाराजगी थी, नोटबंदी से कितना काला धन देश में वापस आया, इसको लेकर विपक्ष जवाब मांग रह था, युवा रोजगार को ले कर सवाल पूछ रहे थे और किसान आन्दोलन कर के दिल्ली की घेराबंदी कर रहे थे। हिंदी हार्टलैंड के अपने तीन गढ़ भाजपा गँवा चुकी थी। मतलब केंद्र सरकार  हर ओर से घिरी हुई थी। 

14 फ़रवरी को कश्मीर के पुलवामा में CRPF के काफिले पर आ’तंकी हमला हुआ और 40 जवान शहीद हो गए। सारे देश में पाकिस्तान को सबक सिखाने और जवानों के शहादत का बदला लेने की मांग उठने लगी। देश जवानों की शहादत में ग़मगीन हो गया और सारे चुनावी मुद्दे पीछे छूट गए। प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से कहा – जो आग आपके दिल में दहक रही है वही आग मेरे दिल में भी दहक रही है। उसके कुछ दिनों बाद ही खबर आई कि वायुसेना के 12 मिराज विमानों ने पाकिस्तान की सरहद को पार कर आ’तंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया  … यानी पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक।

पाकिस्तान भारतीयों के लिए हमेशा से एक भावनात्मक मुद्दा रहा है। बात जब पाकिस्तान की होती है तो भावनाएं चरम पर होती है और बाकी बातें गौण हो जाती है। फ़रवरी के पहले चुनावी सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में गिरावट की बातें साफ़ सामने आ रही थी लेकिन एयर स्ट्राइक के बाद माहौल बदल गया, मुद्दे बदल गए और बदल गई देश की सियासत। राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि एयर स्ट्राइक के बाद प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में इजाफा हुआ है। और ये बात भी तय है कि देश के आने वाले चुनावों में मुख्य मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा बनने वाला है। देश के जो मुख्य मुद्दे थे बेरोजगारी, कृषि समस्या, जीडीपी, भ्रष्टाचार जैसे सारे मुद्दे पीछे चले गए।

यु’द्ध और चुनाव के बीच कनेक्शन :

भारत ने अभी तक 4 जं’गे लड़ी है। 1965, 1971 और 1999 में  पाकिस्तान के साथ और 1962 में चीन के साथ। तीसरी लोकसभा का गठन अप्रैल 1962 में हुआ। नेहरू जी के नेतृत्व में कांग्रेस ने शानदार वापसी की थी। 44.72 फीसदी वोटों के साथ 361 सीटें जीती कांग्रेस ने। इस दौरान भारत चीन से नेहरू के नेतृत्व में 1962 का यु’द्ध हारा और 1965 में लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में पाकिस्तान से 1965 के यु’द्ध में जीत मिली। जीत के बाद शास्त्री जी की मृत्य हो गई  और इंदिरा गाँधी ने देश की बागडोर संभाली। एक ही लोकसभा के दौरान देश दो युद्ध देख चूका था और दो प्रधानमंत्री को गँवा चूका था। 1965 के भारत -पाक यु’द्ध के बाद 1967 में आम चुनाव इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में हुए। पाकिस्तान पर जीत के बाद कांग्रेस सत्ता में तो आ गई लेकिन उसकी सीटें घट गई। 361 सीट से नीचे खिसक कर पार्टी 283 सीटों पर आ गई। पार्टी को करीब 4 फीसदी वोटों का नुकसान उठाना पड़ा। 1962 में 44.72 फीसदी वोट मिले थे तो 1967 में 40.78 फीसदी वोट मिले। याने 3.94 फीसदी वोटों का सीधा नुक्सान। साथ ही साथ 9 राज्यों में कांग्रेस को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी।

भारत पाकिस्तान के बीच दूसरा यु’द्ध 1971 में हुआ। 1971 में आम चुनाव इंदिरा गाँधी ने समय से पहले कराये थे और ये चुनाव यु’द्ध से भी करीब 7 महीने पहले हुआ था और इन चुनावों में कांग्रेस सफलता हासिल की थी। कांग्रेस को 73 सीटों का फायदा हुआ था और उसका वोट प्रतिशत करीब 3 फीसदी बढ़ गया। हालाँकि ये चुनाव भारत -पाकिस्तान से पहले हुए थे। लेकिन इस यु’द्ध में जीत के बाद फायदा लेने के लिए इंदिरा गाँधी ने उत्तर प्रदेश और बिहार में समय से पहले विधानसभा चुनाव करा दिए। बिहार में कांग्रेस की सीटें 118 से बढ़ कर 167 पहुँच गई। 

1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की गठबंधन सरकार थी। 1999 में कारगिल में जं’ग छिड़ गई। करगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 तक चला और इसके बाद चुनाव सितम्बर अक्टूबर में हुए। लेकिन भाजपा को इन चुनावों में कारगिल में मिली जीत का कोई फायदा नहीं हो पाया। पार्टी की सीटें तो जस ते तस रही लेकिन वोट प्रतिशत 1.84 फीसदी घट गया। सबसे ज्यादा नुक्सान भाजपा को उत्तर प्रदेश में हुआ। 1998 में भाजपा को 57 सीटें मिली थी लेकिन 1999 में ये घट कर 29 रह गई। पाकिस्तान के सीमावर्ती राज्य पंजाब में भी भाजपा को सीटों का नुक्सान उठाना पड़ा था। मतलब कि कारगिल विजय का लोगों पर भाजपा के प्रति कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा।

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2019 में क्या है माहौल : 

सरकार और विपक्ष दोनों भले ही एयर स्ट्राइक और उसके बाद में बने यु’द्ध जैसे माहौल का राजनीतिकरण ना करने की सलाह एक दुसरे को दे रहे हों लेकिन सच्चाई ये है कि प्रधानमंत्री समेत सभी भाजपा नेता अपनी चुनावी सभाओं में जम कर एयर स्ट्राइक का क्रेडिट बटोर रहे हैं और इस बार पर खासा जोर दिया जा रहा है कि अब तक कि सरकारें कड़ी निंदा करती थी लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान में घुसकर आ’तंकी ठिकानों को तबाह किया है। राजनीतिक विश्लेषक भी मान रहे हैं कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री की लोकप्रियता फ़िलहाल बढ़ी है और विपक्ष को पानी रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा है। प्रधानमंत्री अपनी रैलियों में जब भी कहते हैं पाकिस्तान में घुस कर मारा तो खूब शोर और तालियाँ बजती है लेकिन अब ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि ये तालियाँ और शोर वोट और सीटों में किता तब्दील हो पाते हैं।