जब नेहरू ने 1947 में अपनी जेब से चुकाया था अपने निजी सचिव का बिल

PATNA: नयी -नयी आजादी हुई थी।तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू  ने द्वारिका नाथ को अपना निजी रख लिया । द्वारिका नाथ भी कश्मीरी मूल के थे।इसलिए द्वारिका नाथ को लगा कि कश्मीरी मूल के प्रधान मंत्री के साथ रह कर वह कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं।पर यह हो न सका। द्वारिका नाथ ने सरकारी फोन का निजी काम के लिए भरपूर दुरुपयोग किया। सिर्फ तीन महीने का बिल आ गया सात हजार रुपए का। सन 1947 में सात हजार रुपए की राशि कितनी बड़ी होती थी,उसकी  आज आसानी से कल्पना की जा सकती है।

प्रधान मंत्री सचिवालय के लिए यह असामान्य घटना थी।इस बिल को देखकर आॅफिस में तहलका मच गया। शिकायत प्रधान मंत्री तक पहुंची। वह आग बबूला हो गए। उन्होंने द्वारिका नाथ को बुलवाया। नेहरू जी ने उसे जमकर फटकारा। वह भी जिद्दी व्यक्ति था।उसने तर्क दिया कि आखिर सरकार के एक विभाग का पैसा सरकार के ही दूसरे विभाग को ही तो मिल रहा है।तो इसमें फिजूलखर्ची कैसे हुई ?

प्रधान मंत्री सचिवालय से निकल कर पैसा डाक तार विभाग को ही तो जाएगा। इस तरह उसने नया आर्थिक सिद्धांत पेश कर दिया।इस पर नेहरू जी और बिगड़े ।उन्होंने कहा कि तुम डाक तार विभाग को अपनी जेब से पैसा अदा कर दो तो मालूम हो जाएगा कि खर्च हुआ कि नहीं। प्रधानमंत्री के कड़े रुख को देख कर द्वारिका नाथ घबरा गया। पहले तो उसने सोचा होगा कि कश्मीरी होने के कारण अंततः वह बच जाएगा। उसके बाद द्वारिका नाथ कर्ज खोजने लगा।

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इतनी बड़ी राशि सस्ती के उस जमाने में एक छोटे कर्मचारी को भला कौन देता ! तब प्रधानमंत्री कार्यालय का इस्तेमाल दलाली के काम में तो होता नहीं था। बेचारा द्वारिका नाथ कहां से पैसे लाता।वह कोई नाजायज काम करा देने का किसी पैसे वाले को आश्वासन भी तो नहीं दे सकता था। तब जमाना दूसरा था।आज तो पैसे वाले किसी सत्ताधारी व्यक्ति को करोड़ों -करोड़ रुपए का बिना सूद और बिना जमानत के दे दे रहे हैं। उस समय की बात ही और थी।जब द्वारिका नाथ कर्ज लेने में विफल हो गया तो उसने प्रधान मंत्री की शरण ली।

नेहरू जी को तब उनकी मशहूर पुस्तकों की राॅयल्टी के रूप में देश-विदेश से बहुत पैसे मिलते थे।उन्हीं पैसों में से द्वारिका नाथ के फोन बिल का भुगतान हो गया।प्रधान मंत्री कार्यालय की गरिमा का ध्यान रखते हुए नेहरू ने ऐसा किया।बाद के वर्षों में नेहरू के कार्यकाल में फोन के दुरूपयोग की कोई खबर नहीं आई। इस धटना पर द्वारिका नाथ बड़ा लज्जित हुआ। यह पता नहीं चल सका कि उस घटना के बाद वह कितने दिनों तक प्रधान मंत्री सचिवालय में टिक पाया था।

लेखक- सुरेंद्र किशोर, वरिष्ठ पत्रकार हैं

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