झारखंड चुनाव में हारकर भी CM नीतीश बने बेताज बादशाह, बिहार में BJP की नहीं चलेगी मनमानी

पड़ोसी झारखंड के चुनाव नतीजों का बिहार में एनडीए और महागठबंधन की सियासत पर भी असर पड़ना तय है। वह भी तब जबकि अगले ही साल बिहार में विधान सभा का चुनाव होना है। जाहिर है सोमवार को झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों में बेहतर और कमजोर प्रदर्शन करने वाले दलों की पूछ-परख भी उसी हिसाब से तय होगी।

यहां गौरतलब है कि झारखंड पांचवा राज्य है जहां सत्ता भाजपा की मुठ्ठी से रेत की तरह फिसल गई। झारखंड बिहार से ही अलग होकर बना है। दोनों राज्यों की सामाजिक – राजनीतिक स्थितियों में काफी समानताएं रही हैं। हाल के दिनों में जदयू – भाजपा के नेताओं में एक-दूसरे पर बयानबाजी चली। हालांकि इसे दोनों दलों के प्रमुख नेता समय-समय पर शांत करते भी दिखे। लेकिन अब यह दिख रहा है कि एनडीए को अटूट रखने के लिए भाजपा अपने बयानबीर नेताओं को कसना चाहे। वहीं, झारखंड में अधिक सीटें लाकर कांग्रेस ने भी यह साबित किया है कि बिहार में महागठबंधन में उसकी पूछ कम नहीं होने वाली।

ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से झारखंड चुनाव पर बिहार के सभी दलों की नजरें टिकीं थीं। बिहार में जदयू – भाजपा की सरकार है। लोजपा भी एक सहयोगी दल है। यदि इस बार भी भाजपा वहां जीत दर्ज करती तो बिहार का सियासी मंजर कुछ और होता। तब बहुत संभव था कि विधानसभा चुनाव में एनडीए के सहयोगी दलों पर भाजपा दबाव बनाने की कोशिश करती। लोकसभा चुनाव में लोजपा को छह सीटें देने के बाद भाजपा और जदयू ने बाकी सीटों का बराबर-बराबर बंटवारा कर लिया था। देश का आमचुनाव भारी बहुमत से जीतने के बाद यदि झारखंड विस चुनाव में भी भाजपा का परचम लहराता तो बिहार में भी वह चुनावी सौदेबाजी में हावी होने की कोशिश कर सकती थी। मगर अब जबकि भाजपा झारखंड में खेत रही है, तब वह शायद इस तरह का दबाव यहां न बना पाए। ऐसे में जदयू पहले की तरह ही बड़े भाई की भूमिका की शर्त पर भी कायम रह सकता है।

यहां यह भी ध्यान देने लायक है कि झारखंड में बिहार की तरह एनडीए का स्वरूप नहीं है। वहां जदयू और लोजपा अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे। यही नहीं हाल के दिनों में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर भी एनडीए के सहयोगी दलों- जहयू और लोजपा के सुर भाजपा से अलग रहे हैं। दोनों मुद्दों पर देशव्यापी विरोध शुरू हुआ तो उनकी ओर से एनडीए की बैठक बुलाने और विमर्श की मांग भी उठ चुकी है। यह संकेत है कि दोनों भाजपा को अधिक भाव देने के मूड में नहीं हैं।