राफेल डील में ‘महा-घोटाला’, मोदी सरकार ने जहाज़ को 40 फीसद से भी ज्यादा दाम देकर खरीदा

LIVE BIHAR : अभी-अभी राफेल डील पर प्रतिष्ठित The Hindu अखबार के कर्ताधर्ता (मालिक समझिए) और इस ग्रुप के प्रधान संपादक रहे एन. राम की खोजी रपट पढ़ी। पढ़कर हिल गया। बस समझ लीजिए कि राफेल डील पर पत्रकारिता के इतिहास का ये कोहिनूर है। ये रपट केंद्र सरकार के ताबूत में आखिरी कील बन सकती है क्योंकि राफेल पे इस रपट में जो जानकारियां दी गयी हैं, उससे ये समझ आता है कि राफेल पर एक तरफ सरकार ने देश की सुरक्षा और दीर्घकालिक हितों से समझौता किया वहीं दूसरी तरफ राफेल जहाज़ को 40 फीसद से भी ज्यादा दाम देकर खरीदा। वो भी दसां नामक ऐसी कंपनी से जिसकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और अगर वह पूरे जहाज़ हमें ना दे तो भारत सरकार कुछ नहीं कर सकती।

भारत सरकार ने फ्रांस की सरकार से इसकी कोई गारंटी नहीं ली। बदले में दिखाने को Letter of comfort ले लिया, सो अगर दसां दीवालिया हो जाए और भारत को वादे के मुताबिक जहाज़ ना दे तो फ्रांस की सरकार कुछ नहीं करेगी। साथ ही INT यानी डील के लिए काम कर रही Indian Negotiating Team के सात सदस्यों में से तीन वरिष्ठ सदस्यों के ऑब्जेक्शन को दरकिनार करके 4-3 के बहुमत से क्रिटिकल मामलों में फैसला लिया गया। रपट ये भी बताती है कि तब के रक्षा मंत्री डील के वक़्त ज़िम्मेदारियों से भाग खड़े हुए और पूरे मामले को कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी के हवाले कर दिया, जिसकी अगुवाई खुद प्रधानमंत्री मोदी जी कर रहे थे और उन्हीं की इच्छा से राफेल की UPA काल वाली डील बदलकर एक नई डील हुई, जिसमें हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को किनारे लगाकर नई शर्तें जोड़ी गयीं। ये देश के लिए कितना और किस तरह नुकसानदायक साबित हुआ है और आगे भी होगा, इसे तथ्यों के साथ विस्तार से समझाया गया है।

एन राम साब ने अपनी रपट में ये भी बताया है कि राफेल पर जिस तरह सरकार ने confidentiality clause की फर्जी बात करके संसद की प्रिविलेज कमिटी तक को जानकारी देने से मना कर दिया, वह जानकारी रक्षा मामलों पे नज़र रखने वाले दुनिया के किसी भी एक्सपर्ट के पास मिल जाएगी। राम साब ने बताया है कि राफेल पर देश हित में सरकार जिस गोपनीयता की बात कर रही है, वो बेईमानी है। पहली बात तो ये कि डील में दाम बताने की (Pricing) की कहीं कोई मनाही नहीं है। दूसरी बात ये कि भारत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पे राफेल विमान में लगने वाले जिन उपकरणों (India Specific Enhancements यानी ISE) की जानकारी देने से मना कर रही है, जिसकी वजह से राफेल जहाज़ के दाम बहुत ज्यादा बढ़ गए, वह सूत्र वाले डिफेंस एक्सपर्ट्स आसानी से पता कर सकते हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने हिन्दू अखबार में ही छपी अपनी संवाददाता दिनकर पेरी की नवम्बर 2018 की एक रिपोर्ट quote की है, जिसमें विस्तार से बताया गया है कि भारत की ज़रूरत के मुताबिक राफेल विमान में क्या-क्या उपकरण और तकनीक जोड़ी गयी है। उन्होंने बताया है कि उनके पास पूरी डिटेल है पर सब का खुलासा वो जानबूझकर नहीं कर रहे क्योंकि राफेल जहाज़ की कीमत बढ़ने और पूरी डील बदलने की उनकी खबर से इसका कोई ज्यादा लेना देना नहीं है।

वो बता रहे हैं कि ये ISE यानी राफेल को लड़ाकों क्षमता बढ़ाने के उपकरण लगभग वही हैं, जो डील मनमोहन सरकार के समय हुई थी। पर राफेल के दाम जिस तरह सरकार ने बढ़ाए, वो भी देश के दीर्घकालिक ज़रूरतों को परे रखकर और फ्रांस की सरकार की गारंटी के बिना ( जो मनमोहन सरकार की डील में थी) उससे मोदी सरकार की नीयत पे बड़ा प्रश्न चिन्ह है। साथ ही मनमोहन सरकार की डील में एक follow on क्लॉज़ था, जिससे भारत सरकार दसां कंपनी से बाद में भी पहले खरीदे गए जहाजों की तादाद का 50 फीसद नए जहाज़ खरीद सकती थी, ठीक उसी दाम और शर्तों पे जिसपे पुराने जहाज़ खरीदे थे। दसां कंपनी दाम नहीं बढ़ा सकती थी पर मोदी जी की सरकार ने ये क्लॉज़ हटा दिया। सिर्फ इसलिए कि दसां कंपनी ने इस शर्त को हटाने पे बेसिक राफेल जहाज़ के दाम 9 फीसद घटा दिए। पर असली खेल ये हुआ कि ISE यानी भारत की ज़रूरतों के मुताबिक साजोसामान राफेल पे लगाने के नाम पे मनमोहन सरकार के समय हुई डील से 40 फीसद ज्यादा रकम ले ली।

यानी राफेल बनाने वाली कंपनी ने भारत सरकार और भारत देश को पलीता लगा दिया या यूं कहें कि सरकार ने पलीता लगवा लिया। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि राफेल बनाने के लिए दसां कंपनी ने जिस तरह अनिल अंबानी के नौसिखिए रिलायंस को off set पार्टनर बनाया, उसे एन राम ने क्रोनी कैप्टिलजिम कहा है यानी सरकारों का एक नए तरह का भ्रष्टाचार, जिसमें सीधे-सीधे रुपयों के रूप में पैसे का लेनदेन नहीं होता है, जैसा बोफर्स घोटाला में हुआ था। आपको बता दूं कि एन राम साब ने ही राजीव गांधी के पीएम रहते बोफोर्स तोप घोटाले की परतें उधेड़कर हंगामा मचा दिया था। लेकिन 70 साल की उम्र पार कर चुके इस बुजुर्ग-अखबार मालिक-पत्रकार ने अबकी बार जब कलम उठाई तो मोदी जी की सरकार को हिलाकर रख दिया है। इसकी गूंज देश में बहुत देर तक सुनाई देगी। केंद्र सरकार को जैसे सांप सूंघ गया है और वह राम साब को झूठा भी नहीं कह पा रही है।

 

वे कोई साधारण दरबारी पत्रकार नहीं हैं। उनका नाम एन राम है। उनकी अप्रतिम साख है। उनकी कही और लिखी बात पत्थर की लकीर है। समझिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी ऊपर है। उसमें सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार के भेजे दस्तावेजों को अधूरा पढ़कर और अंग्रेज़ी समझे बिना अधूरा फैसला देने की गुंजाइश नहीं है। ये एन राम के अपने विस्तृत अध्ययन और प्रामाणिक सबूत जुटाने के बाद लिखी गयी रपट है। इसे देश औऱ दुनिया में कोई हल्के में नहीं लेगा। कह दूं कि इस रपट के बाद मोदी सरकार घोर संकट में है। अनिल अंबानी बीजेपी को बहुत महंगा साबित होने जा रहे हैं। राहुल गांधी और विपक्ष सरकार पे अब और हमलावर होगा। पब्लिक का ओपिनियन और परसेप्शन भी तेजी से बदलेगा। दिन-रात शंख बजाकर न्यूज़ चैनलों पे -राम मंदिर कब बनेगा- चलाने वाले टीभी के संपादकों के लिए भी खतरे की घण्टी है। अगर सरकार बदली तो कांग्रेसी सूत्रों के मुताबिक उनका जो होगा, सो होगा ही, फिलहाल तो पब्लिक राम मंदिर छोड़कर देश के रक्षा सौदे में घोटाला देखेगी। देश से धोखा जनता कभी बर्दाश्त नहीं करती। राम तो उनके दिल में हैं, राम जी का मंदिर घर और मुहल्ले में भी है पर देश एक ही है। सो एन राम की खबर के बाद राफेल अब देश का एक बड़ा रक्षा सौदा घोटाला बन चुका है, जिसके सामने बोफोर्स घोटाला बच्चा घोटाला है। मोदी जी को अगर 2019 में दुबारा सत्ता में आना है तो उन्हें तत्काल कैबिनेट की बैठक बुलानी चाहिए और राफेल सौदे को रद्द कर देना चाहिए।

लेखक : रूबी अरूण, पत्रकार

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