मातृभाषा दिवस : आज भी अपने अधिकारों से वंचित है बिहार की एकमात्र संवैधानिक भाषा मैथिली

PATNA : आज विश्व भर में मातृभाषा दिवस मनाया जा रहा है। बिहार में बच्चों को बचपन से सिखाया जाता है हिंदी हमारी मातृभाषा है। लेकिन क्या सच में हिंदी हमारी मातृभाषा है। नहीं…कदापि नहीं। बिहार के लोगों की लिए हिंदी कभी भी मातृभाषा नहीं हो सकती है। यह तो जबरन सरकार द्वारा हमपर थोपा गया है। यही कारण है कि आज बिहार में बोली जाने वाली मातृभाषाएं अपनी किस्मत पर विलाप कर रही है। सरकार से दुहाई मांग रही है कि आखिर कब उसे उसका अधिकार मिलेगा।

बिहार में कौन-कौन सी भाषाएं बोली जाती है : बिहारी नामक कोई भाषा नहीं है बिहार में। यहां के लोगों का मुख्य रूप से तीन जगहों से भौगोलिक संबंध रहा है। मिथिला क्षेत्र के लोग मैथिली बोलते हैं। मगध क्षेत्र में मगही बोली जाती है। वहीं भोजपुर क्षेत्र में भोजपुरी बोली जाती है। जानकारों के अनुसार अंगिका और बज्जिका को मैथिली की उपबोली मानी जाती है। टोन में मात्र थोरा सं अंतर होता है। वाक्य विन्यास में बहुत तरह की समानता देखी जाती है।

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मैथिली भाषा काफी ऐतिहासिक है। रामायण और बाबा विद्यापति के काल से ही इस भाषा में रचनाएं होती रही है। संभवत: यही कारण है कि वाजपेयी सरकार में इस भाषा को संवैधानिक मान्यता मिल चुका है। साहित्य अकादेमी में यह बहुत पहले से शामिल है। बीपीएससी ओर यूपीएससी की तैयारी करने वाले छात्र भी मैथिली विषय को लेकर परीक्षा देते हैं। बावजूद इसके इसे आज तक स्कूली पठन पाठन में शामिल नहीं किया गया है। ना तो मैथिली भाषा के माध्यम से पठन पाठन होता है और ना ही सीबीएसई स्कूलों में। सवाल उठता है कि अगर कम से कम एक विषय के रूप में भी मातृभाषा को नहीं पढ़ाया जाएगा तो यह कब तक जिंदा रह पाएगी। भोजपुरी भाषा बिहार, उत्तर प्रदेश सहित विश्व के कई देशों में बोली जाती है। भोजपुरी भाषा के लिए काम करने वाली संस्था आखर इसे संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए संघर्षरत है। मगही के लोग भी चाहते हैं कि उनकी भाषा को सरकारी प्रश्रय मिले।

बताते चले कि जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं। मातृभाषा, किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है। गांधी जी के विचार =महात्मा गांधी जी ने मैकाले की इस धूर्ततापूर्ण योजना का अपने लेखों में वर्णन किया है (मैकालेज ड्रीम्स, यंग इंडिया, 19 मार्च 1928, पृ. 103, देखें ) तथा इस घोषणा को “शरारतपूर्ण” कहा है। यह सत्य है कि गांधी जी स्वयं अंग्रेजी के प्रभावी ज्ञाता तथा वक्ता थे। एक बार एक अंग्रेज विद्वान ने कहा था कि भारत में केवल डेढ़ व्यक्ति ही अंग्रेजी जानते हैं- एक गांधी जी और आधे मि. जिन्ना। अत: भाषा के सम्बंध में गांधी जी के विचार राजनीतिक अथवा भावुक न होकर अत्यन्त संतुलित तथा गंभीर हैं।

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गांधी जी के विचार शिक्षा के माध्यम के संदर्भ में स्पष्ट थे। वे अंग्रेजी भाषा को लादने को विद्यार्थी समाज के प्रति “कपटपूर्ण कृति” समझते थे। उनका मानना था कि भारत में 90 प्रतिशत व्यक्ति चौदह वर्ष की आयु तक ही पढ़ते हैं, अत: मातृभाषा में ही अधिक से अधिक ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने 1909 ई. में “स्वराज्य” में अपने विचार प्रकट किए हैं। उनके अनुसार हजारों व्यक्तियों को अंग्रेजी सिखलाना उन्हें गुलाम बनाना है। गांधी जी विदेशी माध्यम के कटु विरोधी थे। उनका मानना था कि विदेशी माध्यम बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालने, रटने और नकल करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है तथा उनमें मौलिकता का अभाव पैदा करता है। यह देश के बच्चों को अपने ही घर में विदेशी बना देता है। उनका कथन था कि-यदि मुझे कुछ समय के लिए निरकुंश बना दिया जाए तो मैं विदेशी माध्यम को तुरन्त बन्द कर दूंगा। गांधी जी के अनुसार विदेशी माध्यम का रोग बिना किसी देरी के तुरन्त रोक देना चाहिए। उनका मत था कि मातृभाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती। उनके अनुसार, “गाय का दूध भी मां का दूध नहीं हो सकता।”