कुंभ पर मोदी-योगी ने दिया उपहार, 450 वर्ष बाद खुला अक्षयवट का द्वार, ये है पौराणिक महत्व

PATNA: प्रयागराज के संगम तट पर स्थित किले में अवस्थित है अक्षय वट। अक्षय वट के द्वार को 450 वर्ष बाद आम लोगों के दर्शन के लिए खोला गया है। इस पौराणिक वृक्ष के दर्शन की मांग को लेकर लंबे समय से मांग उठाई जा रही थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्रलय के दौरान जब सब कुछ जल मग्न हो जाता है तब अक्षय वट को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है।

कथाओं के अनुसार संगम में स्नान का लाभ अक्षय वट के दर्शन पूजन के बिना नहीं मिलता है। कहा जाता है की, सृष्टि की रचना को सुरक्षित रखने के लिए भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने प्रयागराज के पातालपुरी में यज्ञ किया और यज्ञ के बाद, इनके शक्तिपुंज से यह वटवृक्ष उत्पन्न हुआ था। भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने वनवास के समय अक्षय वट के नीचे 3 रात तक निवास किया था।


पहली बार अक्षय वट का 644 ईस्वी में ज़िक्र राजा हर्षवर्धन के काल में आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने की। ह्वेनसांग ने अपनी किताब में लिखा की, मोक्ष प्राप्ति की इच्छा से लोग वृक्ष पर चढ़कर कामकूप तालाब में छलांग लगा देते थे। तालाब में इंसानी नर कंकाल देखकर वह दुखी हो गया था। अकबर के समकालीन अब्दुल कादिर बदायूनी ने अक्षय वट का जिक्र ‘प्रयाग के वृक्ष’ के तौर पर किया है।

इसके बाद मुगल सम्राट अकबर ने यहां किला बनवाया। और जहांगीर ने इस वृक्ष को मिटाने के लिए कटवा कर टीन की चद्दर रखकर, जला दिया। लेकिन यह फिर बार-बार उगता रहा। पेड़ में जले के निशान आज भी मौजूद है। हार मान कर यहाँ आने से रोक लगा दी गयी और शहर का नाम बदल कर ‘इलाहाबाद’ कर दिया गया। सन 1772 ईस्वी के एक फरमान में पातालपुरी मंदिर का पहला ज़िक्र मिलता है। जिससे स्पष्ट होता है की, यह प्राचीन मंदिर किले के निर्माण से पहले और बाद में रहा है।

अब इस किले का इस्तेमाल भारतीय सेना द्वारा किया जा रहा है। अक्षय वट पहले सेना के आधीन था। सेना ने पातालपुरी मंदिर तक पहुंचने के रास्ते का जिर्णोद्धार किया था। अक्षय वट की ख़ासीयत है की, इसके पत्तें दूसरे वट वृक्ष के पत्तों से काफी छोटे और सुंदर हैं।
इस किले में सरस्वती कूप भी है। जिसका दर्शन अब से हो सकेगा। प्रयागराज महाकुंभ शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तीर्थ यात्रियों को अक्षय वट के दर्शन करने का उपहार दिया है।

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