जूता फटने के बाद नए के लिए हरिवंश को करना पड़ा था 1 महीना इंतजार, अब बने रास के उपसभापति

जूता फटने के बाद नए के लिए हरिवंश को करना पड़ा था 1 महीना इंतजार, अब बने रास के उपसभापति

By: Roshan Kumar Jha
August 10, 13:55
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PATNA : प्रभात खबर के पूर्व संपादक और जाने माने वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश अर्थात हरिवंश नारायण सिंह राज्य सभा के उपसभापति बन चुके हैं। बधाइयों का तांता लगा हुआ है। लोग उनसे जुड़े संस्मरण आदि लिख कर उन्हें फेसबुक पर बधाई दे रहे हैं।

लाइव बिहार आज आप लोगों के लिए ऐसे ही रोचक और कई महत्वपूर्ण कहानी सामने लेकर आया है। यह घटना उस समय की है जब हरिवंश स्कूल में पढ़ते थे। कहते हैं कि जूता फट जाने के बाद उन्होंने अपने पिताजी से नए जूते दिलाने को कहा। पिता ने बात टालने के लिए कह दिया कि मोची को कह दिया गया है। बहुत जल्द बनकर तैयार हो जाएगा। फिर क्या था। हरिवंश सब दिन स्कूल से आने के बाद मोची की दूकान पर पहुंचने लगे और पूछने लगे कि मेरा जूता बना या नहीं। जानकारों की माने तो लगभग एक महीन तक यह क्रम जारी रहा।

वरिष्ठ पत्रकार निराला कहते हैं कि एक संपादक और एक एमपी हरिवंश में ज्यादा अंतर नहीं है। वही गाड़ी, वही ड्राइवर, वही लोग। उसी तरह से घर में जाने पर खुद से नाश्ता—पानी कराना। उसी तरह से उनकी पत्नी का खुद सब्जी खरीदने जाना। उसी तरह से हरिवंशजी का खुद पैदल जाकर सैलून में दाढ़ी बनवाना। पटना जाने पर किराये के टैक्सीवाले को फोन कर बुलाना, उसकी सेवा लेना। इकोनॉमी क्लास से चलना। पहले की तरह ही अपने गांव में नेवता—हकारी पूरा करने जाने पर चार—चार दिन बेतहाशा गर्मी में रहना, अपनी सुविधा के लिए छपरा या बलिया के सर्किट हाउस में नहीं चले जाना। उसी तरह से लोगों को फोन करना। कोई बॉडीगार्ड नहीं। सिर्फ अंशकालिक बॉडीगार्ड, जिसकी सेवा भी महीने में अधिक से अधिक दो—चार दिन लेते होंगे या वह भी नहीं। वह भी तब, जब सड़क मार्ग से कहीं दूर जाना हो तो आगे ड्राइवर प्रकाश के साथ बैठने के लिए।

एक प्रसंग सुनाता हूं। यह पहले भी साझा किया था। सांसद बनने के बाद एक बार बनारस गये। सबेरे उनकी इच्छा हुई कि विश्वनाथ मंदिर जायेंगे। वे चाहते तो आसानी से एसपी वगैरह को फोन करवाते, सारा इंतजाम हो जाता। उन्होंने मुझसे पूछा कि कोई है क्या निराला परिचित उधर, ज्यादा कोई सुविधा तो नहीं चाहिए बस, अगर बहुत लंबी लाइन होगी तो सिर्फ दरवाजे तक जाकर दर्शन कर के निकल जायेंगे, ट्रेन पकड़ लेंगे। मैंने कहा कि बात कर लेते हैं एसपी से। उनका कहना था कि नहीं क्या एसपी वगैरह को फोन करोगे, झूठमूठ का प्रोटोकॉल का चक्कर होगा, कोई निजी हो तो देख लो नहीं तो कोई बात नहीं। अपने साथी उत्पल को फोन किया, उत्पल लेकर गये, दर्शन करवायें, लौट गयें।

बनारस से लौटते हुए भभुआ—चांद के एक गांव में गाड़ी मुड़वा दिये। वहां उनका फुफुहारा है। गाड़ी पहुंची। गाड़ी से उतरे। गांव के एक चरवाहा ने देखा। नंगे बदन गमछी पहने हुए वह जा रहे थे। वह रास्ता में जाते हुए हरिवंशजी के पीछे चुपके से आकर अपनी हाथों से आंख को बंद कर दिया। बुझौनी की तरह पूछने लगा कि बतावअ के हईं। कुछ देर तक हरिवंशजी हाथ पकड़ समझने की कोशिश करते रहे और फिर नाम बता दिये। वह हाथ हटा लिया आंख से, खुश हो गया। बोलने लगा कि मरदे तु तो 30 साल बाद हाथ छू के, आवाज से पहचान लेलअ। का तो सांसद बन गईल बाड़अ।

सांसद बनते ही इन्होंने तय किया कि सारे फंड का उपयोग किसी संस्थान को खड़ा करने में करेंगे, नये तरीके का संस्थान। उन्होंने अपने फंड को बिहार में दो स्ंस्थानों की स्थापना के लिए बिहार सरकार को दे दिया। एक आर्यभट्ट विश्वविद्यालय में नदी अध्ययन सह संधान केंद्र और दूसरा आईआईटी पटना में इनडेंजर्ड लैंग्वेज सेंटर का विकास। बिहार में नदियां वरना भी है, अभिशाप भी। नदी को लेकर देश में ही कोई बेहतर केंद्र नहीं है, बिहार में तो अब तक नहीं ही था। नदियों का वैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक अध्ययन हो, उससे संबंधित पढ़ाई हो इसके लिए वह केंद्र खुल रहा है। यह अलग बात है कि इस बात का ना तो ढिंढोरा हरिवंशजी ने पीटा और ना ही ​मीडिया में इसे बताया गया।

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