राष्ट्रीय युवा दिवस: नरेंद्रनाथ से स्वामी विवेकानंद बने मनीषी के जीवन के मुख्य पहलु

PATNA: जिस दौर में स्वामी विवेकानंद अपने जीवन के शिखर पर थे, उस दौर में भारत अंग्रेज़ों का ग़ुलाम था। तब भारत के युवा पीढ़ी को सम्बोधित करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था “उठो, जागो, और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाए”। स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के पारम्परिक बंगाली परिवार में हुआ था। भारत के महान मनीषी स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट में वकील थे। और माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक प्रवृत्ति की गृहणी थी। सन्यास से पूर्व उनका नाम नरेंद्रनाथ दत्त (नरेन) था।

नास्तिक होने के साथ जिज्ञासु प्रवृत्ति के होने की वजह से साधु-संतों से प्रश्न करने की उनकी आदत थी।  इसी तरह एक बार दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण परमहंस के पास गए, और धीरे धीरे उनके द्विव्य प्रभाव से उनकी शरण में आ गए। रामकृष्ण परमहंस ने महासमाधि से पहले नरेन को अपना उत्तराधिकारी बना दिया था। सन 1890 में विवेकानंद ने पूरे देश में भ्रमण किया। इस दौरान खेत्री के महाराज ने उन्हें ‘विवेकानंद’ नाम दिया।


विवेकानंद ने वेदांत सोसाइटी के साथ, रामकृष्ण मिशन की स्थापना की और लोगों के उत्थान तथा धर्म प्रचार के लिए महान काम किया।आध्यात्मिक नेता और समाज सुधारक विवेकानंद ने 1893 को शिकागो की धर्म संसद में हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। उनके विलक्षण भाषण से सभी को आश्चर्य से भर दिया। अमेरिका की अख़बारों ने स्वामी विवेकानंद को धर्म संसद का सबसे महान वक्ता बताया था।

4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में ध्यान करते हुए स्वामी विवेकानंद ने महासमाधि ले ली। विवेकानंद के साहित्य में राष्ट्रवाद, भक्ति, वेदांत और सेवा के प्रेरणादायक मंत्र मिलते हैं। स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी बहुत प्रासंगिक है और सभी के लिए सफलता के सूत्र का काम करते हैं। ज़रुरत है.. अपनी अंतरात्मा को शिक्षक बना कर विवेकानंद की बातों का अनुकरण करने की।

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