हैदराबाद पुलिस की कार्रवाई नज़ीर है, पूरे देश के बलात्कार के आरोपियों के लिए यही सज़ा मुकर्रर हो

PATNA : हैदराबाद एनकाउंटर पर अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। लेकिन अधिकांश बुद्धिजीवियों का मानना है की न्याय व्यवस्था इतनी पंगु हो चुकी है की लोगों को इस एनकाउंटर में कोई बुराई नजर नहीं आ रही। अलबत्ता पूरा देश इस एनकाउंटर पर ख़ुशी मन रहा है।
सेवानिवृत अधिकारी ध्रुव गुप्त ने अपनी फेसबुक इज लिखा है – : हैदराबाद में एक महिला चिकित्सक के साथ सामूगिक बलात्कार कर उसे जिन्दा जला देने वाले चारों आरोपियों के पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने की खबर से देश में संतोष और उत्साह की लहर है। पुलिस का हथियार छीनकर भागने की कोशिश में आरोपियों के साथ हुई यह मुठभेड़ कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार सही है या पुलिस द्वारा भावावेश में लिया गया कोई फैसला, इसपर बहस होगी और जांच दल भी बैठेंगे। सवाल यह भी पूछा जाएगा कि मारे गए युवकों के अपराध साबित हो चुके थे या वे महज़ आरोपी थे ? मुझे इस मुठभेड़ के दूरगामी परिणामों की चिंता है। इस घटना के बाद भीड़ के हाथों बलात्कारियों के न्याय की घटनाओं में निश्चित रूप से इजाफा होने वाला है। इसमें दोषी ही नहीं, निर्दोष लोग भी मरेंगे। हमारी न्याय व्यवस्था पर से जिस तरह लोगों का भरोसा उठने लगा है, उसमें ऐसी ही स्थितियां बनती दिख रही हैं। इससे पहले की देश भीड़ की अराजकता के हवाले हो जाय, सरकार को तुरंत कुछ ऐसे क़दम उठाने होंगे ताकि बलात्कारियों का फैसला त्वरित गति से हो और यह लोगों को दिखाई भी दे। यह काम कुछ मुश्किल भी नहीं है। देश के हर जिले में बलात्कार की घटनाओं के तेज अनुसंधान के लिए प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों का एक अलग कोषांग बने जो एक से दो सप्ताह के भीतर अपना काम पूरा करे। इसी तरह ऐसे कांडों के ट्रायल के लिए हर जिले में एक अलग कोर्ट की व्यवस्था हो जिसके पास ट्रायल के लिए एक महीने भर का समय हो। तारीख पर तारीख की सड़ी व्यवस्था में अब लोगों का दम घुटने लगा है। उच्च और उच्चतम न्यायालय अपील में पंद्रह दिनों से ज्यादा का वक्त न ले। दया याचिकाओं का राजनीतिक खेल बंद हो। हर हाल में तीन महीनों के अन्दर आरोपियों का फैसला हो और ऐसा न करने वाले अधिकारी दंडित किए जाएं। ऐसा हुआ तभी क़ानून और न्याय के प्रति लोगों का भरोसा लौटेगा, वरना जल्द ही इस देश का संविधान भीड़तंत्र के हवाले होने वाला है।
वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्ता लिखते हैं कि हैदराबाद, बक्सर, माल्दा, सीतामढ़ी और फिर उन्नाव में अथवा देश के किसी अन्य हिस्से में भी बलात्कार के बाद पीड़िता की जिंदा जलाकर हत्या या मार डालने की मिलती जुलती घटनाएं रोंगटे खड़ा करने, सिहरन पैदा करने के साथ ही लगातार हमारे सभ्य समाज का सदस्य होने पर सवाल खड़े कर रही हैं। हम एक हत्यारे और बलात्कारी समाज में रह रहे हैं! बर्बर बलात्कारी-हत्यारों के मन में हमारी पुलिस और कानून व्यवस्था का जैसे कोई डर ही नहीं रह गया है। इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो बलात्कार और हत्या की शिकार हमारी तमाम बहन, बहू और बेटियों को अदालतों से शीघ्र न्याय और बलात्कारी हत्यारों को कठोरतम दंड नहीं मिल पाने का भी एक कारण हो सकता है कि इन घटनाओं को लेकर आक्रोशित समाज बड़े पैमाने पर हैदराबाद में जन भावना अथवा जन दबाव के नाम पर पुलिस के द्वारा मुठभेड़ के नाम पर बलात्कार और हत्या के चारों आरोपियों को मार देने का समर्थन कर रहा है। लेकिन जन दबाव और जनभावना पर आधारित ‘मुठभेड़’ भविष्य के लिए खतरनाक संकेत भी हो सकता है। इसे न्याय कतई नहीं कह सकते। हम बिना किसी भेदभाव के सभी जघन्य बलात्कारी-हत्यारों को उनके किए के लिए अदालतों से शीघ्रातिशीघ्र कठोरतम दंड दिए जाने के पक्षधर हैं। मृत्युदंड का हम समर्थन नहीं करते लेकिन जब तक हमारे संविधान और न्याय व्यवस्था के तहत मृत्युदंड का प्रावधान है, इन जघन्य बलात्कारी-हत्यारों को फांसी दी जानी चाहिए। शीघ्र न्याय के लिए त्वरित अदालतों (फास्ट ट्रैक कोर्ट्स) का गठन किया जाना चाहिए जिनसे पीड़िता को समय से न्याय और गुनहगारों को कठोरतम दंड मिल सके। लेकिन त्वरित न्याय के नाम पर पुलिस और भीड़ को ‘न्याय’ करने या सजा देने का अधिकार दिए जाने के हम सख्त खिलाफ हैं। पुलिसिया अथवा भीड़तंत्र का न्याय तानाशाही की ओर ले जाएगा जिसका शिकार कोई भी हो सकता है।
वरिष्ठ पत्रकार रूबी अरुण ने इस एनकाउंटर को देश की न्याय व्यवस्था के लिए नजीर माना है। वे अपने फेसबुक पर लिखती हैं कि यही सज़ा हर बलात्कार के आरोपी को मिलनी चाहिए। हैदराबाद पुलिस की इस कार्रवाई को मैं नज़ीर मानती हूँ। और अब पूरे देश के बलात्कार के आरोपियों के लिए यही सज़ा मुकर्रर हो। शुरूआत,उन्नाव रेप कांड के आरोपी से की जाए। यह वक्त है कि पूरा देश कमिश्नर सज्न्ननार रेड्डी के पक्ष में खड़ा हो जाए ,उनके खिलाफ किसी भी किस्म की कोई कार्यवाही ना हो। कोई भी जांच ना हो इस बात की मांग करें। वे इस मामले को गलत मानने वालो को ही कटघरे में खड़ा कर रहीं हैं। वे कहती हैं, क्या बेहूदगी है? कितनी बेहयायी है। बेटियों से हो रहे बलात्कार आप नहीं रोक पा रहे। महिलाओं पर हो रहे जुल्म पर आप काबू नहीं कर पा रहे।
कानून व्यवस्था आप संभाल नहीं पा रहे। लेकिन, सारे सबूतों के साथ बलात्कार और जिन्दा जलाकर बेटी को मार देने जो आरोपी गिरफ्तार हुए, उनके एनकाउंटर पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। उनके मानवाधिकारों की बात की जा रही है? ऐसी बात करने वाले भी मानसिक रोगी हैं। वह भी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के आरोपी के बराबर ही दोषी हैं। सबसे पहले तो इन कमबख्त चैनल वालों को हैदराबाद बलात्कार के आरोपियों के एनकाउंटर के मसले पर पैनल डिस्कशन बंद कर देने के न्यायिक आदेश दे देने चाहिए कि कोई भी चैनल इस मसले पर तब तक कुछ भी नहीं बोलेगा जब तक तेलंगाना पुलिस का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आ जाता। आज तक हजारों बेगुनाह फर्जी एनकाउंटर में मार दिए गए , तब तो किसी ने छाती नहीं पीटी ? फिर चार दुर्दांत बलात्कारियों के एनकाउंटर पर क्यों छाती फट रही है ?अगर हैदराबाद पुलिस यह कह रही है कि बलात्कारियों ने भागने की कोशिश की, पुलिस वालों के हथियार छीनना चाहा। इसलिए उनका एनकाउंटर किया गया तो आप उन्हें उनकी बात सबूतों के आधार पर रखने का मौका तो दीजिए, फिर सही और गलत की बात कीजिए।