जदयू को भाजपा का दो टूक जवाब, कहा- नीतीश के नाम पर नहीं, मोदी के नाम पर होगा चुनाव

जदयू को भाजपा का दो टूक जवाब, कहा- नीतीश के नाम पर नहीं, मोदी के नाम पर होगा चुनाव

By: Roshan Kumar Jha
June 13, 07:06
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PATNA : क्या माइनस नीतीश बिहार में एनडीए की हैसियत कुछ भी नहीं है। अगर नीतीश कुमार को 'बड़का भाई' मानकर बीजेपी ने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा तो क्या वाकई एनडीए महागठबंधन से पिछड़ जाएगा?

जेडीयू का ये दावा उसका 'गुरूर' है या 'गलतफहमी', या फिर सियासी पैंतरा, जो अब सियासी हलकों में चर्चा का विषय है। दरअसल अलग-अलग तरीके से करीब एक पखवाड़े से जेडीयू की ओर से तमाम दावे हो रहे हैं। बीजेपी को आगाह किया जा रहा है, चेतावनी भी दी जा रही है कि वक्त रहते संभल जाएं, नहीं तो बिहार का सियासी 'खेल' बिगड़ सकता है। लेकिन अभी-अभी पुराने कांग्रेसी और नीतीश के खासमखास नए-नवेले जेडीयू नेता बने अशोक चौधरी ने नया बयान देकर फिर बवेला खड़ा कर दिया है।  


अशोक चौधरी ने क्या कहा
जेडीयू एमएलसी अशोक चौधरी ने कहा कि नीतीश ही बिहार में एनडीए का सर्वमान्य चेहरा हैं। उनके नेतृत्व में अगर अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा गया तो एनडीए को बड़ा नुकसान होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि नीतीश को एनडीए के चेहरे के तौर पर बिहार में पेश करने जैसा कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि गठबंधन में कोई ऐसा नेता नहीं जो कि उनकी तरह सभी को स्वीकार्य हो। 

अशोक चौधरी ने कहा कि अगर सीएम नीतीश कुमार को दूसरा स्थान दिया जाता है तो यह वैसा ही होगा कि अपने सबसे अच्छे बल्लेबाज को 12वें खिलाड़ी के स्थान पर रहने को कहा जाए और पारी की शुरुआत करने के लिए कम अनुभवी खिलाड़ी पर विश्वास किया जाए। 

बीजेपी का जवाब
जेडीयू अगर अपनी ताकत और नीतीश के चेहरे का धौंस दिखा रहा है तो जाहिर तौर पर बीजेपी भी कहां चुप रहने वाली है। पार्टी के पास तो नीतीश से भी कहीं बड़ा चेहरा मौजूद है, जिसकी बदौलत देश के करीब 21 प्रदेशों में उसकी हुकूमत चल रही है। इसी बिहार में 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने एकतरफा जीत भी हासिल की थी। 

लिहाजा अशोक चौधरी के बयान पर बिना देरी किए बीजेपी नेता और नीतीश सरकार में कृषि मंत्री प्रेम कुमार ने अपना जवाब सुना दिया। प्रेम कुमार ने स्पष्ट किया कि अगला लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा और इसको लेकर कोई विवाद नहीं है। 

अब तक कोई निर्णय नहीं
नीतीश 2020 के विधानसभा चुनाव में तो जाहिर तौर पर एनडीए का चेहरा होंगे, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी क्या भूमिका होगी, इसी पर रार है। हालांकि अभी तक औपचारिक तौर पर इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। नीतीश कुमार और अमित शाह ने भी सीधे तौर पर इसको लेकर अभी कुछ नहीं कहा है। लेकिन प्रदेश स्तर के नेताओं की ओर से रोज बयान आ रहे हैं। 

नीतीश बिन एनडीए की हालत
जेडीयू की गरमी और बीजेपी की नरमी की वजह समझना बहुत जरुरी है, लेकिन उसके पहले 2014 के लोकसभा और 2015 के विधानसभा चुनाव के परिणाम और हालात का अवलोकन आवश्यक है। जेडीयू ने 2014 में मोदी विरोध के कारण बीजेपी से अलग होकर लोकसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन मोदी लहर में वो महज 2 सीट ही जीत सका था। वहीं, एनडीए की 31 सीटों में बीजेपी को 22 सीटें मिली थीं, रामविलास पासवान की एलजेपी को 6 और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी को 3 सीटें मिली थीं। वोट शेयर के लिहाज से बीजेपी सबसे आगे रही। बीजेपी को 29.5 प्रतिशत वोट मिले। एलजेपी को 6.1 प्रतिशत और आरएलएसपी 3.1 प्रतिशत। कुल मिलाकर एनडीए को करीब 39 फीसदी वोट मिले। त्रिकोणीय मुकाबले में बीजेपी को टक्कर लालू यादव ने ही दी, जिनकी पार्टी आरजेडी को 20.3 फीसदी वोट मिले। जबकि जेडीयू करीब 12 फीसदी पर सिमट गया।

2014 के चुनाव में माइनस नीतीश एनडीए को कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन 2015 में बाजी पलट गई। विधानसभा चुनाव में नीतीश पुरानी रंजिश भूल लालू के साथ चले गए, नतीजा ये हुआ कि महागठबंधन ने एनडीए को धूल चटा दी। नीतीश को 71(अब 70), लालू को 80(अब 81) और कांग्रेस को 27 सीटें मिली। जबकि बीजेपी 52, एलजेपी और आरएलएसपी 2-2 और जीतनराम मांझी की पार्टी मात्र एक सीट जीत पाई। यानी इस चुनाव में नीतीश के नहीं रहने का फर्क बीजेपी गठबंधन को पड़ा।

सीटों में फर्क लेकिन वोट प्रतिशत बढ़िया
2015 के चुनाव में भले ही बीजेपी सीटों के लिहाज से तीसरे पायदान पर रही लेकिन वोट प्रतिशत में अव्वल रही। बीजेपी को 29.5 प्रतिशत वोट मिले। वहीं, एलजेपी को 6.1 प्रतिशत और आरएलएसपी 3.1 प्रतिशत मिले। कुल मिलाकर एनडीए को करीब 39 फीसदी वोट मिले। यहां ये बताना भी वाजिब हो जाता है कि लोकसभा चुनाव में एनडीए को 45 फीसद से भी ज्यादा मत मिले थे। 


2009, 2014 और 2015 से भिन्न होगा 2019 
नीतीश की पार्टी जब 'बड़का भाई' वाला तर्क देती है तो वह 2014 के बजाय 2009 और 2015 की स्थिति का जिक्र करती है। 2009 में वो बिहार में बीजेपी से ज्यादा ताकतवर थी, जबकि 2015 में वो लालू के साथ थी। वहीं बीजेपी 2014 को आधार मान रही है, क्योंकि उसका तर्क है कि नीतीश के बगैर भी जब हम 31 सीटें जीत सकते हैं तो नीतीश को इतना 'भाव' क्यों दिया जाए?

हालांकि जानकार मानते हैं कि 2019 का चुनाव पुराने चुनावों से बिल्कुल होगा। 2014 और 2015 से भी स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है। मोदी 'लहर' शायद उतना कारगर साबित होता नहीं दिख रहा है, ये भी एक कारण है कि बीजेपी को नीतीश का साथ हर हाल में चाहिए होगा। वहीं जिस तरीके से विपक्षी खेमा मजबूत होता दिख रहा है, बीजेपी नहीं चाहेगी कि नीतीश फिर से पाला बदल लें। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक ये भी कहते हैं कि विकल्प तो नीतीश के पास भी सीमित है। लालू की तरफ से उनके लिए 'नो इंट्री' जैसे हालात हैं तो वहीं बीजेपी से अलग होकर 2014 में उन्होंने अपनी सियासी कूबत का हश्र भी देख चुके हैं।


महज सियासी पैंतरा!
तो नीतीश की पार्टी रह-रहकर बीजेपी को 'गीदड़भभकी' क्यों दिखा रही है। वो ऐसा क्यों साबित करना चाह रही है कि उसके बगैर बिहार में एनडीए की नाव डूब जाएगी। राजनीतिक विश्लेषक इसे दूर की चाल बताते हैं। उनके मुताबिक ये नीतीश का पैंतरा है, सीटों की संख्या बढ़ाने और अपनी महत्ता जताने की। 2020 के लिए वो अभी ही सब कुछ तय कर लेना चाहते हैं, उन्हें भी डर है कि 2019 में अगर बीजेपी मजबूत होकर उभरी तो 2020 में आंख दिखा सकती है। जबकि बीजेपी को जल्दबाजी बिल्कुल भी नहीं है, वो अंतिम समय तक इंतजार करना चाहती है ताकि नीतीश की 'हैसियत' का सही अंदाजा लग सके।

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