देश के मूड के इतर चलता रहा है पूर्णिया, जनता ने उसे नेता चुना, जिसकी सरकार केंद्र में नहीं बनी

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PATNA : देश के मूड से पूर्णिया का मिजाज इतर है। पिछले दो दशक के दौरान पूर्णिया लोकसभा सीट पर प्रत्याशियों की जीत-हार का आकलन करें तो यहां की जनता ने उस जनप्रतिनिधि को चुना, जिनके दल की सरकार केंद्र में नहीं बनी। 2004 और 2009 में देश की सत्ता डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए के हाथों में रही। इस दौरान पूर्णिया की जनता ने भाजपा नेता उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह को अपना नेता चुना। 1999 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनी तो यहां के लोगों ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को अपना नेता चुना। और तो और 2014 के चुनाव में जदयू-भाजपा अलग-अलग थी। केंद्र में नरेंद्र मोदी की के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी, जबकि यहां के लोगों ने जदयू के संतोष कुशवाहा को सांसद चुना। हालांकि बाद में जदयू और भाजपा के बीच गठबंधन हो गया। दो दशकों के दौरान जनता के इस मूड के कारण भी पूर्णिया केंद्रीय सत्ता के गलियारे में वह मुकाम नहीं बना पाया, जिसका वह हकदार है। कमोबेश इसका असर यहां के विकास पर भी जरूर पड़ा।

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सीमांचल के पांच सांसद केंद्र की अलग-अलग सरकारों में मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे हैं। मगर, पूर्णिया लोकसभा से चुनाव जीतकर गए एक भी सांसद अब तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं पा सके। प्रमंडल के बाकी जिलों के पांच सांसद ऐसे रहे जो इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री बने और सीमांचल की राजनीति को नई पहचान दी।

अररिया से एक, कटिहार से दो और किशनगंज के दो सांसद केंद्रीय सत्ता के गलियारे तक पहुंचे। साउथ ब्लॉक में पूर्णिया के किसी सांसद के पहुंचने का इंतजार अभी भी लोगों को है। अररिया के सांसद और सीनियर कांग्रेसी डूमर लाल बैठा लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री रहे। अलग-अलग मंत्रालयों में वह मंत्री रहे। इसी तरह किशनगंज के कांग्रेस सांसद मो. रफीक आलम भी केंद्रीय मंत्री बने। कटिहार से तारिक अनवर भी केंद्रीय सत्ता तक पहुंचे। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी की सरकार में इन तीनों सांसदों की अच्छी खासी पैठ थी। किशनगंज से तस्लीमुद्दीन भी मंत्री बने। हालांकि, तस्लीमुद्दीन को बाद में मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके अलावा कटिहार से भाजपा सांसद निखिल चौधरी भी कुछ अर्से तक केंद्र में मंत्री रहे।

आजादी के सात दशक बीत गए। 19 वीं लोकसभा का निर्वाचन होने वाला है। पूर्णिया की जनता ने अब तक दस सांसद भी चुने हैं। तीन सांसद ऐसे हैं जिन्हें दो-दो बार जीत मिली, लेकिन केंद्रीय सत्ता की सीढ़िया तय करने में अब तक कोई भी सांसद सफल नहीं रहे। भले ही पूर्णिया सीमांचल का सबसे बड़ा जिला है। प्रमंडल का मुख्यलाय है। लेकिन, राजनीतिक तौर पर पूर्णिया जिले का पिछड़ापन अभी तक दूर नहीं हो पाया है। इस राजनीतिक पिछड़ेपन का यहां के विकास पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ा है।

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