पैसे के अभाव में भाई की हुई थी मौत, 20 रु. में दूसरों की जिंदगी बचा रहे हैं ये डॉक्टर

पैसे के अभाव में भाई की हुई थी मौत, 20 रु. में दूसरों की जिंदगी बचा रहे हैं ये डॉक्टर

By: Manish Kumar
May 09, 16:17
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Patna. देश में मेडिकल सेक्टर में लूटने की धूम मची हुई है। धरती के भगवान कहे जाने वाले कई डॉक्टरों और बड़े हॉस्पिटल पर आरोप लग चुका है कि मरने के बाद भी मरीजों के शव बकाए पैसे के लिए नहीं देते है। गरीबों का जमकर शोषण करते हैं। लेकिन एक ऐसे भी न्यूरो सर्जन डॉक्टर श्याम किशोर हैं जो मात्र 20 रुपए में गरीब से लेकर अमीर मरीजों का इलाज करते हैं। क्योंकि इनका मिशन है पैसे के अभाव में किसी मरीज की मौत ना हो। क्योंकि वह खुद इस दर्द को झेले है।

भाई की इलाज के अभाव में हो गई मौत
डॉ. श्याम ने livebihar.live से विशेष बातचीत में कहा कि मेरा बचपन गरीबी में बीता है। इसलिए मैं गरीबों का दर्द आसानी से समझता हूं। मुझे वो दिन भी याद है जब मेरे छोटे भाई की इलाज के अभाव में मौत हो गई थी। हॉस्पिटल में भर्ती कराने के लिए पैसा नहीं था। जिसके कारण देर हो गई थी। इस घटना ने मेरे परिवार को बड़ा सदमा दिया था। 

20 रुपए में करते हैं इलाज
डॉ. श्याम ने कहा कि मैं सप्ताह में दो से तीन दिन समय निकालता हूं। तीनों दिन 70-75 मरीजों को देखता हूं। हर मरीज के इलाज के बदले मात्र 20 रुपए लिया जाता है। इस दौरान अमीर मरीजों से भी 20 रुपए ही लिया जाता है। एक साल में करीब तीन हजार से अधिक लोगों को देखता हूं। जो यह पैसा आता है वह गरीब बच्चों की पढ़ाई दिखाई पर खर्च करता हूं। इस दौरान मैं अपने छुट्टी के दिन भी अपने गांव मोकामा में जाकर गरीब मरीजों का इलाज करता हूं। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि मेरा खर्च कैसे चलता है। तो बता दूं कि एक मेरा हॉस्पिटल है। वहां पर मरीजों का इलाज करता हूं। उसी पैसे से मेरा परिवार चलता है।

गरीब भी चाहते हैं अच्छे डॉक्टर से इलाज
डॉ. श्याम ने कहा कि आज भले ही गरीब लोग समाज में है। रिक्शे चलाने वाले हो या भूजा बेचने वाले हो। जब परिवार के लोग बीमार होते हैं तो वह भी चाहते हैं कि अच्छे डॉक्टर से इलाज हो। लेकिन वह महंगे डॉक्टर के पास पैसे के अभाव में नहीं जा पाते है। ऐसे लोगों मेरे पास इलाज के लिए आते है। मैं मात्र 20 रुपए पर देखता हूं। समय उतना ही देता हूं। जीतना में अपने क्लिनिक पर मरीज को देता हूं।

4 बच्चों का उठाते है खर्च
डॉ. श्याम बताते हैं कि जो 20 रुपए लोगों से लेते है उसका भी मैं अपने उपर खर्च नहीं करता हूं। चार गरीब बच्चों को किसी के मां तो किसी के पिता नहीं है। ऐसे चार बच्चों को मैं हर माह पढ़ाई के लिए पैसा देता हूं। अगर मेरे छोटे प्रयास से इन बच्चों की जिदंगी संवर जाती है तो यह मेरे लिए बहुत बड़ी कामयाबी होगी।

झोपड़ी में गुजरा है बचपन
डॉ. श्याम ने बताया कि मेरा घर मोकामा में पड़ता है। मेरे पिता भी रेलवे में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी थे। जो उनको पैसा मिलता था उसी से परिवार का गुजारा चलता था। परिवार भी बड़ा था 4 भाई और 6 बहनें थी। यहां तक की हमलोग झोपड़ी में रहते थे। इस दौरान जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आए। मोकामा में शुरूआत की पढ़ाई करने के बाद मैं पटना आया और साइंस कॉलेज से पढ़ाई शुरू की। किस्मत ने साथ दिया और आगे बढ़ता रहा। 1992 में एमबीबीएस किया। जिसके बाद 1997 में एमएस किया।

पिता के पसंद से की शादी
डॉ. श्याम ने बताया कि जब मैं डॉक्टर बन गया तो पिता जी ने मेरी शादी ठीक की। मेरे शादी में पिता ने कोई दहेज नहीं लिया और सादगी से शादी हो गई। शादी के बाद पत्नी संगीता को मैंने आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। आज वह भी डॉक्टर बन गई है। दो बेटी और एक बेटा है। बड़ी बेटी सोनाली किशोर लॉ कर रही है। बेटा सुमित कुमार और छोटी बेटी सौम्या हैं।

आज भी संघर्ष के दिन है याद
डॉ. श्याम बताते है कि वह संघर्ष का दिन आज भी याद है। यही कारण है कि मेरा सादगी जीवन जीता हूं। डॉ. श्याम आज तक जूता नहीं पहने हैं। वह साधारण चप्पल या सैंडल ही पहनते हैं। हाथ की अंगुलियों में कोई डायमंड का या चांदी का रिंग नहीं होता है और ना ही गले में सोने का चैन पहनते हैं। वह साधारण इंसान की तरह रहते हैं।
 

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