मुजफ्फरपुर कांड पर पीएम मोदी के मौन से भी घिनौना है नोबल विजेता कैलाश सत्यार्थी की चुप्पी

मुजफ्फरपुर कांड पर पीएम मोदी के मौन से भी घिनौना है नोबल विजेता कैलाश सत्यार्थी की चुप्पी

By: Roshan Kumar Jha
August 10, 10:50
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PATNA : मुजफ्फरपुर कांड के बाद सोशल मीडिया में एक नया विवाद शुरू हो गया है। लोग इस घटना के बाद उजागर हो रहे कई बालिकाओं गृह मामले पर बचपन बचाओ आंदोलन चलाने वाले और नोबेल पुरस्कार विजेत कैलाश सत्यार्थी की तलाश कर रहे हैं और ट्रोल कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार कुमुद सिंह ने लिखा है कि-ब्रजेश तो छोटा मोटा ।कैलाश सत्यार्थी के एनजीओ की जांच हो तो कई सरकारें गिर जायेंगी। वैसे ही चुप नहीं वो। कैलाश सत्यार्थी का मौन मुझे प्रधानमंत्री के मौन से ज्यादा घिनौना और अभिचारी लग रहा है। दुनिया किस किस को नोबल दे देती है पता नहीं। रामदेव के गौशाला से साढ और कैलाश सत्‍यार्थी के एनजीओ द्वारा छुडाये गये बच्चे कहा जाते हैं यह किसी को खबर नहीं है। 34 बच्चों के बलात्कार पर किसी ने "बचपन बचाओ" को याद नहीं किया।नोबल मिला है।।

Sajjan Kr Verma ने लिखा है कि- नोबल पुरस्कार मिलने के पूर्व कैलाश सत्यार्थी को देश के कितने लोग जानते थे और आज भी लोग इस बात पर चकित है कि उन्होनें आखिर ऐसा क्या काम किया जिसके कारण नोबल मिला।


बताते चले कि मदर टेरेसा (1979) के बाद कैलाश सत्यार्थी सिर्फ दूसरे भारतीय हैं जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया है। कैलाश सत्यार्थी बच्चों के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो सालों से बाल अधिकार के लिए संघर्षरत हैं। सत्यार्थी भारत में एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ चलाते हैं जो बच्चों को बंधुआ मजदूरी और तस्करी से बचाने के काम में लगी है।

कैलाश सत्यार्थी ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़कर पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से बाल अधिकारों की रक्षा और उन्हें और मजबूती से लागू करवाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया, 80 हजार बाल श्रमिकों को मुक्त कराया और उन्हें जीवन में नयी उम्मीद दी। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के रूप में उनकी संस्था लोगों के बीच में काफी लोकप्रिय है। सत्यार्थी इस संस्था के जरिए उन बच्चों की मदद करते हैं जो अपने परिवार के कर्ज उतारने के लिए बेचे दिए जाते हैं। फिर उन्हें ट्रेनिंग दी जाती है जिससे वो अपने समुदाय में जाकर ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए काम करें।

दिल्ली एवं मुंबई जैसे देश के बड़े शहरों की फैक्टरियों में बच्चों के उत्पीड़न से लेकर ओडिशा और झारखंड के दूरवर्ती इलाकों से लेकर देश के लगभग हर कोने में उनके संगठन ने बंधुआ मजदूर के रूप में नियोजित बच्चों को बचाया। उन्होंने बाल तस्करी एवं मजदूरी के खिलाफ कड़े कानून बनाने की वकालत की और अभी तक उन्हें मिश्रित सफलता मिली है।

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