सहरसा की कैली देवी को सलाम, खोईंछा में मिले सिलाई मशीन से बदल रही है गांव वालों की तकदीर

PATNA : नैहर से खोईंछा में लेकर आयी सिलाई-कटाई कैली कला के जरिए न केवल अपनी एक पुत्री व दो पुत्रों की भरण-पोषण एवं पढाई-लिखाई करती है, बल्कि समाज की बेटियों को भी हुनरमंद बनाने में जुटी हुई है। कैली समाज की बेटियों के बीच प्रेरणा की पर्याय बनी हुई है। बाल विवाह एवं निरक्षरता की दर्द झेल रही महादलित परिवार की बेटी 20 वर्षीय कैली अब समाज की अन्य बेटियों को इस आग में झोंकना नहीं चाहती है। इसीलिए कैली ससुराल में रहकर भी समाज की बेटियों को आर्थिक निर्भर एवं स्वावलंबन जीवन जीने के लिए सिलाई व कटाई की तालीम देकर हुनरमंद बनाने के संकल्प को साकार कर रही है। कैली देवी जिले के कहरा प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत मुरली बसंतपुर के गांव मैडगरा घाट वार्ड सं. 10 सकुल सादा की पत्नी है। आर्थिक तंगी व बेरोजगारी से त्रस्त सकुल भी हरियाणा के गुरूग्राम में मजदूरी करता है।

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धर्मूला नदी के तट मैडगरा घाट महादलितों का एक छोटा-सा सघन बस्ती है। इस बस्ती में छोटी-सी झोपड़ी के देहरी पर कैली आसपास के गांवों में सुंदरवन, मुरली भरना एवं मैडगरा घाट की बेटियों को सुबह से ही सिलाई-कटाई की शिक्षा देने में जुट जाती है। पहले पेपर कटिंग के सहारे कटिंग सिखाती है और फिर कपड़ों पर प्रैक्टिस करवा कर काज, बटन, तूरपई, पाईपीन, हूक आदि के साथ-साथ धीरे-धीरे कपड़ों को मशीन पर सिलाई करना सिखलाती है। कैली देवी।

खगड़िया जिला के मानसी प्रखंड अंतर्गत यमनी गांव कैली देवी की मायके है। कैली के पिता बिंदेश्वरी सादा ने कम उम्र में बेटी की शादी रचा दी। कैली गांव के ही स्कूल में पढी और सिलेट-पेंसिल से आगे नहीं बढ सकी। पूरी तरह से अक्षर ज्ञान भी नहीं है। सिर्फ किसी तरह हस्ताक्षर कर लेती है। पति भी सिर्फ साक्षर है। कैली के बच्चों में सबसे बड़ी 10 वर्षीय बेटी मौसम, पुत्र रणधीर एवं धर्मेंद्र है। जिसे पढाने के लिए किसी भी प्रयास से चुकना नहीं चाहती है।

कैली देवी कहती है कि कम उम्र में शादी अशिक्षा का सबसे बड़ा प्रमाण है। निरक्षरता का कलंक जीवन भर साल रही है। निरक्षर होने की वजह से ही माता-पिता ने कम उम्र में शादी करा दी। परिवार में जागरूकता की भी कमी थी। लेकिन ससुराल आकर लगा कि क्यों न गांव की बेटियों को मायके में सिखी सिलाई कला को अन्य बेटियों को सिखा कर स्वावलंबन के साथ आर्थिक निर्भर बना दूं। ताकि अपनी जरूरतों के लिए किसी के सहारे का इंतजार नहीं करना पड़े।