अभी अभी : अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि बातचीत से निकले हल, फैसला सुरक्षित

PATNA : सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि मामले पर  सुनवाई के दौरान जस्टिस बोबडे ने कहा कि ये सिर्फ जमीन का मसला नहीं बल्कि दिल, दिमाग और  भावनाओं से जुड़ा मसला है। हम इस मामले की गंभीरता को समझते हैं इसलिए हम सिर्फ चाहते हैं कि बिना किसी की भावना को ठेस पहुंचे आपसी बातचीत से मसले का हल निकल जाए। जस्टिस बोबडे ने कहा कि हम इस मसले की राजनितिक असर को भी समझते हैं। अगर चीजें बाहर आई तो बात बिगड़ सकती है। कोर्ट ने सलह दी कि मध्यस्थता को अत्यंत गोपनीय रखा जाना चाहिए। लेकिन हिन्दू महासभा मध्यस्थता के खिलाफ है। हिंदू महासभा के वकील ने कहा कि मध्यस्थता का कोई अर्थ नहीं होगा क्योंकि हिन्दुओं के लिए ये एक  एक भावुक और धार्मिक मुद्दा हैं। कोर्ट ने कहा कि हम इतिहास जानते हैं और अतीत में जो हुआ उस पर हमारा कोई जोर नहीं लेकिन जो हमारे हाथ में है वो वर्तमान है।

बीते 26 फ़रवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी  सुनवाई में कहा था कि अगर दोनों पक्षों में एक फीसदी भी बातचीत के जरिये मसले को सुलझाने की संभावना है तो इसकी कोशिश होनी चाहिए। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान सुझाव दिया था कि यदि  सहमति के आधार पर विवाद का समाधान खोजने की एक प्रतिशत भी संभावना हो तो सभी  पक्षकारों को बातचीत  का रास्ता अपनाना चाहिए। विवादित परिसर के तीन पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान में से निर्मोही अखाड़ा ने अदालत की मध्यस्थता में बातचीत की पहल का स्वागत किया था जबकि रामलला विराजमान ने बातचीत से इनकार किया था।

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मामले में एक प्रमुख पक्षकार रामलला विराजमान का कहना है कि बातचीत से फैसला हमें मंजूर नहीं। रामलला विराजमान  का कहना है कि पहले भी इस मामले में बातचीत की कोशिश हो चुकी है लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। विवादित भूमि पूरी तरह से रामलला की जन्मभूमि है और इसमें मध्यस्ता की कोई गुंजाइश ही नहीं है। तब कोर्ट ने कहा था कि आप तीनों पक्षों की मर्जी के बिना कोई फैसला नहीं होगा लेकिन आप तय कर के बताएं कि क्या मध्यस्थता की गुंजाइश है? एक अन्य पक्षकार निर्मोही अखाड़ा बातचीत के जरिये मामले को सुलझाने के लिए तैयार है।