गरीबों-पीड़ितों की रक्षा के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी में हाथ में लिए शस्त्र, प्रकाशउत्सव की धूम

PATNA : श्री गुरु गोबिंद सिंह जी को ‘संत सिपाही’ कहा जाता है। उनके सैनिक व्यक्तित्व पर भी उनका आध्यात्मिक व्यक्तित्व छाया रहता था। गुरु जी ने किसी को दुख देने के लिए या किसी लोभ-लालच के लिए तलवार नहीं उठाई वरन गरीबों-पीड़ितों की रक्षा और अत्याचार के विरोध के लिए शस्त्र हाथ में लिए। युद्ध करते समय भी गुरु जी का हृदय उच्च मानवीय गुणों से ओत-प्रोत रहता पर शस्त्रों को उन्होंने न केवल अपनी लेखनी में ‘पीर’ का दर्जा दिया, बल्कि अपनी रचनाओं में इनका विशेष उल्लेख किया।

गुरु अर्जुन देव जी की शहादत के बाद गुरु हरगोबिंद साहिब ने ‘मीरी’ और ‘पीरी’ भाव ‘शक्ति’ और ‘भक्ति’ की प्रतीक दो तलवारें धारण कीं। गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी ने मीरी पीरी के संकल्प को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से खालसा का सृजन किया और हर सिख के लिए कृपाण या श्रीसाहिब धारण करना अनिवार्य कर दिया, इसीलिए गुरु गोबिंद सिंह ने अपनी रचनाओं में शस्त्रों के बारें में ये लिखा है…


देवताओं और दैत्यों के युद्ध पर आधारित गुरु साहिब की इस रचना में शामिल ‘वार श्री भगौती जी’ मंगलाचरण से शुरू होती है। इसकी पहली पक्ति है ‘प्रथम भगौती सिमर कै, गुरु नानक लईं ध्याए’। यूं तो भगौती शब्द देवी भगवती से संबंधित है जो कि खुद शक्ति की प्रतीक हैं, परंतु गुरु साहिब ने यहां पर तलवार को शक्ति का प्रतीक मानते हुए उसके लिए ‘भगौती’ शब्द का उपयोग किया है।

चंडी दी वार में परमसत्ता को संबोधित होकर कहा गया है, ‘प्रथमै खंडा, साज के जिन सब संसार उपाया’, भाव सबसे पहले परमात्मा ने खंडा (शक्ति) का सृजन किया और उसके बाद में पूरे संसार का सृजन हुआ। गुरु साहिब की वीर रस की ये वाणी एक संत को सिपाही होने का फर्ज समझाती है और उसे नकारात्मक शक्तियों का नाश करने के लिए प्रेरित करती हैं।

‘भगौती दी वार’ में गुरु साहिब ने खड़ग, तुपक (तोप), कवच (संजां), लोहे की जाली (पटेल), घोड़े की संजो (पाखर), रणसिंघा (युद्ध का ऐलान करने वाला वाद्य यंत्र) आदि जंगी सामान का जिक्र किया है। बचित्तर नाटक ग्रंथ में गुरु साहिब ने ‘नमस्कार श्री खड़ग को करों सु हित चित लाए’ से शक्ति के प्रतीक खंडे को नमस्कार कर के इस ग्रंथ की शुरुआत की है। इस ग्रंथ को गुरु साहिब ने नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध हुए युद्धों के अलावा अपने युद्धों का भी वर्णन किया है।

इस ग्रंथ में गुरु साहिब ने बाण (तीर), खड़ग, खंडा, कृपाण, दंड, तुफंग (बंदूक), गृस्टंग (बड़ी गदा), चक्र, तुपक (तोप), सैहथी (तलवार), बरछी, बरछा, नागणी, तेग, कैबर (एक तरह का तीर), धोप (सीधी लंबी तलवार), पटंग (किरच जैसी तलवार), छौही (छवि) आदि शस्त्रों का जिक्र करते हुए इन्हें प्रणाम किया है। वह कहते हैैं ‘जिते शस्त्र नामं। नमस्कार तामं।’ यानी जितने भी हथियारों के नाम हैैं उन सभी को मेरा नमस्कार।

इसी ग्रंथ में गुरु गोबिंद सिंह जी ‘हलब्बी’, ‘जुनबी’, ‘सिरोही’, आदि प्रसिद्ध शहरों के नामों पर बनी तलवारों का भी जिक्र करते हैं। हलब्बी नाम की तलवार हलब्ब नाम के शहर में बनती थी। यह शहर शाम देश (मौजूदा मिस्न, सीरिया का क्षेत्र) में स्थित था। जुनबी तलवार जुनब शहर की मशहूर तलवार थी, जो आरमेनिया का मशहूर शहर था। इसी प्रकार सिरोही तलवार सरोह शहर में बनाई जाती थी, जो भारत में चौहान जाति के राजपूतों का मशहूर शहर रहा है।

गुरु साहिब के चारों साहिबजादों की शहादत के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगल बादशाह औरंगजेब को जीत का जो पत्र लिखा था, उसे जफ़रनामा कहते हैैं। इसमें गुरु जी ने ओरंगजेब से उसके जुल्मों का जिक्र करने के अलावा यह भी कहते हैैं कि जब अपने अधिकार लेने के सभी रास्ते बंद हो जाएं तो तलवार के दस्ते पर तलवार के दस्ते को हाथ में लेना वाजिब होता है। फारसी भाषा में लिखे जफ़रनामा में वे लिखते हैं, ‘चूं कार अज हमह हीलते दर गुजश्त, हलाल अस्त बुरदन ब शमशीर दस्त’।

दशम ग्रंथ में शामिल ‘शस्त्रनाम माला पुराण’ में ‘अष्टकूट’ या पहेली विधि में हथियारों का जिक्र शामिल है। इसमें खड़ग, बरछी, तीर, चक्र पाश, बंदूक, आदि हथियारों का जिक्र किया गया है। शस्त्र धारण करने वाले समूह को सेना या शस्त्रणी कहा गया है और शस्त्र धारण करने वाले को शस्त्रपति, शस्त्र चलाने का ज्ञान रखने वाले को शस्त्रवर्ति’ और शस्त्र रखने के स्थान को शस्त्रागार कहा गया है।

‘बरछी’ को इस ग्रंथ में सेहथी, शक्ति, शुभअरि, कुंभअरि, कुंभह, लक्षमणअरि, घटोतकचअरि कह कर पुकारा गया है। महाभारत का पात्र घटोचकच्छ जहां बरछी से मारा गया था वहीं लक्षमण भी बरछी से मूर्छित हुए थे। इसलिए इनशस्त्रों के लिए उनके नामों का भी उपयोग किया गया है। इसी तरह चक्र को विष्णु जी और भगवान कृष्ण द्वारा धारण किए जाने के कारण इन्हें विष्णु शस्त्र, कृष्णायुद्ध आदि नामों से पुकारा गया है।


बंदूक के लिए जलज कुंदिनी, धराराट पृश्टिणि, बारिण, हथिनी, रथनी, घोरिणी, बरमणी, चक्रणी, पंचानन घोखनी, अभिमानिनी, नृपणी, भूपणी, भानी, मेधनी आदि नामों से पुकारा गया है। तीर के लिए धनुषग्रज, चरमछेदक, मृघा, बाण, आकाशाचारी, रजनीसुर धरधर, चंद्र धरधर, मीन केतवायुद्ध, शिवअरि शस्त्र, इंद्रसुत आयुद्ध, धन्नजय अस्त्र आदि नामों से पुकारा गया है। इसके अलावा कुंति पुत्र करण, भीष्म पितामाह व रावण का देहांत भी तीर से होने के कारण इस शस्त्र को उनके नामों से करणांतक या सूर्यसुतअरि, दशाननांतक व गंगापुत्रअरि भी कहा गया है।

पंजाब के विभिन्न गुरुद्वारों में गुरु गोबिंद सिंह जी के अस्त्र-शस्त्र आज भी सुशोभित हैं। आनंदपुर साहिब में तख्त श्री केसगढ़ साहिब में संगतों के दर्शनों के लिए इन्हें रखा गया है। तख्त साहिब पर अलग केबिन में इन्हें रखा गया है। गुरु साहिब से संबंधित 26 शस्त्र हैं। इनमें 12 शस्त्र लंबे अरसे से तख्त साहिब पर सुशोभित हैं। इनमें छह शस्त्र भाई गुरबख्श सिंह (भाई राम कुंवर, बाबा बुड्ढा परिवार के वंशज) से नांदेड़ से और बाकी छह शस्त्र इंग्लैंड से 1966 में लाए गए थे। खंडा साहिब से गुरु गोबिंद सिंह जी ने खंडे की पाहुल तैयार करके पांच प्यारों को अमृत छकाया था। यह खंडा 1942 के बाद इस्तेमाल नहीं हुआ।

कुछ साल पहले नाभा रियासत से 14 शस्त्र श्री केसगढ़ साहिब लाए गए थे। इन्हें सुलतानपुर लोधी भेज दिया गया है और 7 जनवरी से पंजाबभर के लिए शुरू हुई शस्त्र यात्रा में संगतों को दर्शन करकवाने ले जाया जा रहा है। इन शस्त्रों में गुरु गोबिंद सिंह जी की कृपाण जो उन्होंने भाई तरलोक सिंह को बख्शीश की थी, गुरु गोबिंद सिंह की गातरें (कमर) की कृपाण, राय कंदोला को बख्शीश की कृपाण, छोटा बरछा (भाला), लोहे की नोक वाले लकड़ी के पांच तीर तथा एक लोहे के तीर के अलावा तीन इंच की छोटी श्री साहिब भी हैं।

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